Thursday, February 6, 2014

हिंदू सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य (Hindu Emperor Chandragupta Maurya)

चंद्रगुप्त मौर्य का जन्म 340 ईसापूर्व को पाटलिपुत्र में हुआ था ,वह पहला मौर्य सम्राट था और अखंड भारत पर भी राज करने वाला  करने वाला पहला सम्राट था ।
जन्म से ही वह गरीब था ,उसके पिता की मृत्यु उसके जन्म से पहले ही हो गई थी,कुछ लेखो के अनुसार वह अंतिम नंद सम्राट धनानंद का पुत्र था और उसकी माँ का नाम मुरा था ।
हर ग्रंथ में मतभेद है चंद्रगुप्त की उत्पत्ति को लेकर ।
बोद्ध ग्रंथ अनुसार चंद्रगुप्त मौर्य मोरिया नाम के काबिले से ताल्लुक रखता था जो शाक्यो के रिश्तेदार थे ।
मुरा या तो काबिले के सरदार की लड़की थी या धनानंद की दासी थी ।
10 वर्ष की उम्र में उसकी माँ मुरा की मृत्यु हो गई थी और तब चाणक्य नाम के ब्राह्मण ने अनाथ चंद्रगुप्त को पाला ।
चाणक्य को धनानंद से बदला लेना था और नंद के भ्रष्ट राज को ख़त्म करना था ।
चाणक्य ने चंद्रगुप्त सम्राट जैसी बात देखि और इसीलिए वे उसे तक्षिला ले गए ।
तक्षिला में ज्ञान प्राप्ति के बाद चाणक्य और चंद्रगुप्त ने पहले तो तक्षिला पर विजय पाई और आस पास के कई कबीलों और छोटे राज्यों को एक कर पाटलिपुत्र पर हमला किया ।
सिक्किम के कुछ काबिले मानते है की उनके पुरखे चंद्रगुप्त मौर्य की सेना में थे ।
320 ईसापूर्व में चंद्रगुप्त मौर्य मगध का सम्राट बन चूका था ।
इसके बाद उसने कई युद्ध लड़े और सम्पूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप पर एकछत्र राज किया ।
298 ईसापूर्व में चंद्रगुप्त मौर्य की मृत्यु हो गई ।
हिंदू और बोद्ध ग्रंथ चंद्रगुप्त मौर्य के अंतिम दिनों के बारे में कुछ नहीं लिखते पर कुछ जैन लेखो के अनुसार चंद्रगुप्त मौर्य जैन भिक्षु बन गया था और कई दिनों तक उपवास रखने के कारण उसकी मृत्यु हो गई ।
पर केवल जैन ग्रंथ के आधार पर कैसे कहे की चंद्रगुप्त मौर्य ने जैन धर्म अपना लिया था ??
जैन ग्रंथो में राम को जैन कहा गया है,सम्राट भारत को भी ,सम्राट अजातशत्रु को भी और प्राचीन काल में कुछ जैन तो गौतम बुध को भी जैन मानते थे पर यह सब जैन नहीं थे ।
हो सकता हो की जैन ग्रंथो की बात सही हो या गलत भी हो सकती है ।
जैन कथाओ के अनुसार चंद्रगुप्त मौर्य ने 16 सपने देखे थे और उन सपनो का अर्थ जानने चंद्रगुप्त दिगंबर पंथ के जैन गुरु भद्रबाहु के पास गए ।
भद्रबाहु ने चंद्रगुप्त को उन सपनो का अर्थ बताया फिर चंद्रगुप्त मौर्य जैन बन गया ।
इसके बाद अपने पुत्र बिंदुसार को राजा बना कर चंद्रगुप्त मौर्य भद्रबाहु के साथ चले गए ।
पर जैन कवी हेमचन्द्र के अनुसार भद्रबाहु की मृत्यु चंद्रगुप्त मौर्य के राज के 12वे वर्ष में ही हो गई थी ,तो चंद्रगुप्त किसके साथ गए थे ??
बचपन से ही चंद्रगुप्त चाणक्य के साथ रहा था और हिंदू धर्म का उसपर काफी असर था ।
चाणक्य के अर्थशास्त्र में विष्णु की आराधना करने की बात कही गई है ।
चंद्रगुप्त के काल के सिक्को पर हमें जैन प्रभाव कही नज़र नहीं आता जबकि हमें उसके सिक्को पर राम,लक्ष्मन और सीता के चित्र मिलते है ।
चित्र नंबर 1,2 और 3 देखे
इनमे आपको 3 मानवों की आकृति दिखेगी जो राम,लक्ष्मन और सीता के है ।(नंबर 1 चित्र का नाम है GH 591)
अब सम्राट अशोक ने बोद्ध धर्म अपनाया था और उसके सिक्को पर आप बोद्ध प्रभाव देख सकते है ।
चित्र नंबर 4 देखे ,आपको बोद्ध धर्म चक्र नज़र आयेगा ।
यदि चंद्रगुप्त जैन था तो उसके सिक्को में जैन चिन्ह क्यों नहीं है ??

केवल एक मत के आधार पर चंद्रगुप्त मौर्य को जैन कहना ठीक नहीं  ।

जय माँ भारती

Saturday, January 25, 2014

भारत में मधु (Honey in India)

मधु या शहद मानव शारीर के लिए काफी लाभदायक है ,आयुर्वेद में मधु काफी महत्वपूर्ण है चिकित्सा की दृष्टी से ।
सिंधु सरस्वती सभ्यता में हमें थोड़े बहोत प्रमाण मिलते है मधु के ।
ऋग्वेद में भी मधु का उल्लेख है

मधु वाता रतायते मधु कषरन्ति सिन्धवः |
माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः ||
मधु नक्तमुतोषसो मधुमत पार्थिवं रजः |
मधु दयौरस्तु नः पिता ||
मधुमान नो वनस्पतिर्मधुमानस्तु सूर्यः |
माध्वीर्गावो भवन्तु नः ||
(ऋग्वेद 1.90.6-8)

अर्थ :
हर बहती हवा को मधु बहाने दो
हर नदी और समुद्र को मधु बनाने दो
हमारी दवाए मधु बन जाये
सुबह और संध्या को मधु से भरदो
हर नकारात्मक उर्जा को मधु में बदल दो
हमारे पालनहार ,इस आकाश को मधु से भरदो
वृक्षों को मधु में बदल दो
सूर्य को मधु में बदल दो
ऐसा करदो की हमारी गाये मधु दे ।

इसके अलावा उपनिषदों में भी मधु का उल्लेख है ,मधु यज्ञो में भी उपयोग होता है ।
मधु के कई चिकित्सीय गुण है ।
आयुर्वेद में 8 तरह के मधुओ का उल्लेख है
1) माक्षिकं :इस तरह का मधु आँखों के रोग ,
हेपेटाइटिस ,पाइल्स,दमे के रोग में,खासी और टूबरकलोसिस में उपयोग होता है ।

2) भ्रामाराम : खून की उलटी के समय उपयोग किया जाता है ।
3) क्षौद्रम : मधु रोग (Diabetes ) के इलाज में उपयोग होता है ।
4) पौथिकम : मधु रोग और लिंग संक्रमण में उपयोग आता है ।
5) चथ्रम : यह परजीवी द्वारा संक्रमण,मधु रोग और खून की उलटी के इलाज म3 उपयोग होता है ।
6) आर्ध्यम : आँखों के इलाज के लिए ,खासी और अनेमिया के उपचार में उपयोग होता है ।
7) ओउद्दलकम :स्वाद बढाने और स्वरासुधि में उपयोगी,विष और लेप्रोसी के उपचार में भी उपयोगी ।
8) दालम : पाचन शक्ति बढाने ,उलटी और खासी के उपचार में उपयोग होता है ।

मधु सदियों से भारतीय मिठाईयो में भी उपयोग होता आया है ।
आज कई कंपनिया लोगो को मुर्ख बनाकर चीनी का पानी बेचते है खासकर विदेशी कंपनिया ।

जय माँ भारती

Thursday, January 23, 2014

वैदिक रूस (Vedic Russia )

एक वक़्त का जब पूरी दुनिया हिंदू धर्म था और इसका एक प्रमाण भी मिला ।
रूस में  Staraya Maina  गाव में विष्णु की मूर्ति मिली है जो 7-10 इसवी पुराणी है ।
रुसी भाषा में Staraya Maina का अर्थ है गावो की माँ या सबसे पुराना गाव ।
Staraya Maina आज की आबादी से 10 गुना ज्यादा आबादी थी प्राचीन काल ।
रूस में वाइकिंग या स्लाव लोगो के आने से पूर्व शायद वहा भारतीय होंगे या उनपर भारतीयों ने राज किया होगा ।
महाभारत में अर्जुन के उत्तर कुरु तक जाने का उल्लेख है ,महाभारत में उत्तर कुरु का जो उल्लेख है वो रूस से मिलता जुलता है ।
इसके बाद सम्राट ललितादित्य मुक्तापिद और उनके पोते जयदीप के उत्तर कुरु को जीतने का उल्लेख है ।
वह विष्णु की मूर्ति शायद वही मूर्ति है जिसे ललितादित्य ने स्त्री राज्य में बनवाया था ,चुकी स्त्री राज्य को उत्तर कुरु के दक्षिण में कहा गया है तो शायद Staraya Maina पहले स्त्री राज्य में हो ।( स्त्री राज्य पर मेरा पोस्ट जल्द आ रहा है )
रूस में ईसायत और इस्लाम जैसे पश्चिमी धर्म आने से पहले वहा नॉर्स धर्म जो वाइकिंग लोगो का था और स्लाविक धर्म था ।
नॉर्स और स्लाविक लोग दोनों ही आर्य परिवार की भाषा बोलते थे और दोनों का धर्म हिंदू धर्म से मिलता जुलता भी है ।
नॉर्स देवता थोर और स्लाविक देवता पेरून दोनों ही बिजली के देवता है और देवताओ में मुख्य ठीक इंद्र की तरह हिंदू धर्म में ।
आज कल रूस में स्लाविक वैदिक धर्म भी अपनाया जा रहा है जो रूस के प्राचीन धर्म और वैदिक धर्म का मिश्रण है ।
शायद रूस में पहले हिंदू धर्म रहा हो और फिर उसने अपना अलग रूप ले लिया ।
रूस में गई नगरो के नाम में "ग्राद" शब्द उपयोग होता है जिसका अर्थ दुर्ग या किला होता है उधारण के लिए स्टेलिनग्राद 
ग्राद शब्द संस्कृत शब्द गढ़ से मिलता है जिसका अर्थ भी दुर्ग या किला होता है ।
कुछ विद्वानों के अनुसार रूस या रसिया संस्कृत नाम ऋषि वर्ष से उत्पन्न हुआ हो ।

जय माँ भारती

Wednesday, January 15, 2014

सिंधु सरस्वती सभ्यता में दिपावली (Deepawali in Indus Valley Civilization )

यु तो यह पोस्ट मैं दिवाली में करने वाला था पर तब समय नहीं मिला और अब दुबारा दिवाली का इंतज़ार नहीं कर सकता ।
दिवाली को गुप्त काल से जोड़ा जाता था पर कुछ सबूत इशारा करते है की दिवाली सिंधु सरस्वती सभ्यता के लोग भी मनाते थे ।
हाल ही के वर्षो में पुरातत्वविदो को कई दीये प्राप्त हुए है जिनकी खास बात यह है की ये स्त्री की मूर्ति है जिनके हाथ कटोरे के आकार के है जिसमे तेल जाता और यह दीपक की तरह इस्तेमाल होता ।
यह खास मुर्तिया घरो के बहार लगाये जाते जिससे प्रतीत होता की ये मुर्तिया हाथों में दीप लिए हमारा स्वागत कर रही हो ।
पुरातत्वविदो को प्राप्त कई दीपक वर्ष में केवल कुछ ही दिनों के लिए जलाये जाते थे जो इशारा करता है की ये दीप दिवाली के पर्व पर जलाये गए थे ।
साथ ही पुरातत्वविदो को रंगोली के भी अवशेष मिले है जो इस बात की पुष्टि करता है की सिंधु सरस्वती सभ्यता के लोग दीपावली मनाते थे ।
दिवाली में सरस्वती माँ की भी पूजा होती है ,यह प्रथा उन लोगो की थी जो सरस्वती के किनारे रहते थे ,इसके अलावा धोलावीरा जो सरस्वती के किनारे था उसके सभा गृह या महल कहे जाने वाले भाग में एक कुवा मिला है जिसमे सीडिया नीचे कुवे के तल तक जाती है,तल में एक खिड़की है ,पुरातत्वविदो के अनुसार उस खिड़की में खास मोके पर दीपक जलाया जाता था ,शायद उस कुवे में किसी प्रकार की पूजा होती हो ।
क्युकी उस कुवे में सरस्वती नदी का पानी आता हो इसीलिए धोलावीरा के लोग उस कुवे में सरस्वती नदी के पानी की पूजा सरस्वती देवी मानकर करते हो ।
दिवाली में दरवाजे के बहार स्वस्तिक बनाया जाता है और सिंधु सरस्वती सभ्यता में स्वस्तिक के काफी चिन्ह मिले है ।

(नंबर 2 तस्वीर में हड़प्पा की मुर्तिया है जीके सर पर दीप है )

जय माँ भारती

Sunday, January 12, 2014

चुंबकीय उत्तोलन और हिंदू मंदिर (Magnetic levitation and Hindu Temples)

आपने जेकी चेन की The Myth नाम की फिल्म तो देखि ही होगी ??
नहीं तो जरुर देखे ,उसमे जेकी चेन एक पुरातत्व विद था जो भारत में एक मंदिर में आता है ।
उस मंदिर में साधू उड़ पा रहे थे क्युकी 2 काले जादुई पत्थर के कारण ।
यह कल्पना नहीं पर सत्य है ,पर साधू के बजाये मुर्तिया हवा में तैरती थी ।

चुम्बक का उल्लेख हिंदू ग्रंथ में
मणिगमनं सूच्यभिसर्पण मित्यदृष्ट कारणं कम्||
वैशेषिक दर्शन ५/१/१५||
अर्थात् तृणो का मणि की ओर चलना ओर सुई
का चुम्बक की ओर चलना,अदृश्य कर्षण
शक्ति के कारण है । सोत्र
यह कणाद मुनि के ग्रंथ  वैशेषिक दर्शन है ,कणाद मुनि 600 ईसापूर्व के थे यानि गौतम बुद्ध के समय का ।
चुंबकीय उत्तोलन या Magnetic Levitation का अर्थ होता है चुंबकीय बल के सहारे तैरना ।
हर चुंबक के 2 ध्रुव होते है उत्तर और दक्षिण
चुंबक का नियम होता है की विपरीत ध्रुव एक दुसरे को आकर्षित करते है और समान ध्रुव एक दुसरे को धकेलते है ।
उधारण :
उत्तर ध्रुव दक्षिण ध्रुव को या दक्षिण ध्रुव उत्तर ध्रुव को आकर्षित करता है
पर
उत्तर ध्रुव उत्तर ध्रुव को या दक्षिण ध्रुव दक्षिण ध्रुव को धकेलता है ।
यही नियम बुलेट ट्रेन में काम आता है ।
2 समान ध्रुव एक दुसरे को धकेलते है जिससे इतना बल पैदा होता है की ट्रेन आगे बड़े ।
इसी का उपयोग हिंदुओ ने अपने मंदिरों में किया ।
मुझे 4 हिंदू मंदिरो का विवरण मिला है जिसमे चुंबकीय उत्तोलन का उपयोग हुआ था ।

सोमनाथ मंदिर (600 इसवी )
गुजरात में स्थित सोमनाथ मंदिर को गुजरात के यादव राजाओ ने बनाया था 600 इसवी में ।
सोमनाथ ज्योतिर्लिंगो में से एक है ।
कई मुस्लमान राजाओ ने इसको तोडा और इसमें स्थित शिव लिंग भी तोड़ दिया ।
स्थानीय लेखो के अनुसार सोमनाथ मंदिर का शिव लिंग हवा में तैरता था ।
हिंदुओ के अलावा मुसलमानों ने भी इसका वर्णन किया ।
क्वाज़िनी अल ज़कारिया सन 1300 इसवी में भारत में आया था ,वे फारसी लेखक थे और दुनिया के अजीब अजीब वस्तुओ पर लिखते थे ।
सोमनाथ के शिवलिंग पर क्वाज़िनी लिखते है :- "सोमनाथ मंदिर के बिच में सोमनाथ की मूर्ति थी ,वह हवा में तैर रही थी ,उसे न ऊपर से सहारा था  न नीचे से ।स्थानीय ही क्या मुस्लमान भी आश्चर्य करेगा ।"
इस विवरण से पुष्टि हो गई है की सोमनाथ मंदिर में शिव लिंग हवा में तैरता था ।
कुछ विद्वानों अनुसार यह आँखों का धोका था ।

सम्राट ललितादित्य मुक्तापिद का विष्णु मंदिर (700 इसवी )
सम्राट ललितादित्य कश्मीर के महान राजा थे जिन्होंने अरब और तिब्बत के हमले को रोक और कन्नौज पर राज किया जो उस समय भारत का केंद्र माना जाता था ।
स्त्री राज्य जो असम में ही कही स्थित था उसे जीतने के बाद सम्राट ललितादित्य ने स्त्री राज्य में ही विष्णु मंदिर की स्थापना की थी ।
विवरणों के अनुसार उस मंदिर में स्थित विष्णु जी की मूर्ति हवा में तैरती थी ।
इस मंदिर की सही स्थिति नहीं पता और इसके अवशेष अभी तक नहीं मिले ।
विद्वानों के अनुसार जिस कदर मुसलमानों ने ललितादित्य का सूर्य मंदिर तोड़ दिया था ठीक वैसे ही इस मंदिर को भी तोड़ा गया था ।

वज्रवराही का मंदिर (800 इसवी )
यह मंदिर है तो बोद्ध पर हिंदू देवी वराही को समर्पित है ।
यह मंदिर भूटान में Chumphu nye में स्थित है ,इस मंदिर के भीतर फोटो लेने की मनाही है इसीलिए वराही देवी की हवा में तैरते हुए फोटो नहीं ।
कई प्रत्यक्षदर्शी मंदिर में जा चुके है और उनके अनुसार वराही देवी की मूर्ति और थल के बिच 1 ऊँगली भर जगह है और मूर्ति बिना सपोर्ट के हवा में है ।
स्थानीय लोगो के अनुसार वह मूर्ति मनुष्य निर्मित नहीं बल्कि प्रकट हुई है ।
कुछ विद्वानों के अनुसार वह मूर्ति चुंबक के कारण हवा में तैर पा रही है ।
क्युकी भूटान और तिब्बत का बोद्ध धर्म बुद्ध के उपदेशो पे कम और हिंदू उपदेशो पर ज्यादा है इसीलिए मंदिर बनाने का यह ज्ञान हिंदुओ से बोद्ध भिक्षुओ को मिला ।
यही एक बची हुई ऐसी मूर्ति है जो सिद्ध करती है की हिंदू मंदिरों में मुर्तिया हवा में तैरती थी ।

कोणार्क का सूर्य मंदिर (1300 इसवी )
इसा के 1300 वर्ष बाद उड़ीसा में पूर्वी गंग राजाओ ने कोणार्क का सूर्य मंदिर बनवाया था ।
स्थानीय कथाओ के अनुसार कोणार्क के सूर्य मंदिर में सूर्य देव की जो मूर्ति थी वह हवा में तैरती थी ।
पुरातात्विक विश्लेषण से पता चला है की मंदिर का मुख्य भाग चुंबक से बना था जो गिर गया था ।
कम से कम 52 टन चुंबक मिलने की बात कही जाती है ।
उसी चुंबक वाले भाग में वह मूर्ति थी ,यह सबसे अच्छा साबुत है हिंदू मंदिरों में चुंबकीय उत्तोलन का क्युकी इस मंदिर में चुंबक मिला है ।
मूर्ति को हवा में उठाने के साथ चुंबक का एक और उपयोग था यानि चुंबकीय चिकित्सा ।
चुंबकीय चिकित्सा का अर्थ है चुंबक की उर्जा से इलाज करना ।
कोणार्क के सूर्य मंदिर का बहोत सा ढाचा गिर गया था जिसमे वह चुंबक से बना भाग भी था ।

भारत में चुंबक का उल्लेख 600 ईसापूर्व से मिलता है ,मुसलमानों के साथ साथ पुरातात्विक सबूत भी हिंदू मंदिरों में चुंबकीय उत्तोलन के सबूत देते है ।

(नीचे फोटो में गणेश जी की मूर्ति हवा में तैर पा रही है चुंबकीय बल के कारण )

जय माँ भारती

Saturday, December 21, 2013

लोकतंत्र की उत्पत्ति (Origins of Democracy )

लोकतंत्र की उत्पत्ति कहा हुई थी ??
इस सवाल का जवाब हमें यूनान बताया गया था पर सच तो यह है की लोकतंत्र भारत में तबसे है जब यूनानी जंगलो में रहते थे ।
कई भारतीय विद्वानों ने कहा की लोकतंत्र की उत्पत्ति भारत में हुई पर इसे हिंदू राष्ट्रवादी सोच कहकर नकार दिया गया ।
अच्छा
यूरोपियन कहते है की कैलेंडर की खोज उन्होंने की ,पहिये की खोज उन्होंने की ,खाने में मसाले का उपयोग भी उन्होंने किया वगेरा वगेरा
वाह रे यूरोपियो
तुम करो तो खोज
और हम करे तो हिंदुत्व की बड़ाई
क्या है की भारत में पुरातात्विक खोज ज्यादा नहीं होती और न ही भारत पुरातत्व से जुड़े कामो में आगे है ,जिस दिन पुरातत्व से जुड़े कामो में भारत आगे बढेगा उस दिन सच सामने आ जायेंगा ।

अब टॉपिक पर आते है
लोकतंत्र राजतंत्र या राजशाही से भी पुराना है ,जब मानव कबीलों में रहते थे तबसे है जबकि राजशाही 5000 ईसापूर्व में शुरू हुआ ।
कबीलों में जो शिकार में माहिर होता उसे ही मुखिया बनाया जाता ,यह एक तरह से लोकतंत्र ही था जिसमे लोग अपने सरदार को चुनते ।

पहले यूनानी लोकतंत्र और भारतीय लोकतंत्र में फरक जान लेते है ।

नी लोकतंत्र
यूनान में लोकतंत्र 500 ईसापूर्व मे शुरू हुआ था और सिकंदर के काल में वहा लोकतंत्र का अंत हुआ।
आज के लोकतंत्र मे नेताओ को चुना जाता है पर प्राचीन यूनान मे चुनाव कुछ खास मुद्दों के लिए होते थे जैसे युद्ध करना चाहिए ?निर्माण कार्य होना चाहिए या नहीं और राज्य चलाने के लिए कुछ खास फैसले होते ।यूनान में सिटीजन और स्लेव यानि गुलाम ऐसे 2 भागो में लोगो को बाटा जाता था ,गुलाम अक्सर दुसरे देश या नगर के होते और सिटीजन के मुकाबले वे अधिक थे ,सिटीजन उसी नगर के मूल लोग होते थे ,यूनान के लोकतंत्र में केवल सिटीजन ही वोट कर सकते ,महिला या गुलाम नहीं यानि 20% लोग ही वोट कर सकते थे ।
यूनान में अरिस्तोतल और सोक्रेत जैसे कई विद्वान हुए जो लोकतंत्र के विरोधी थे और मानते थे की लोकतंत्र भ्रष्ट लोगो के हाथ है ।

भारतीय लोकतंत्र
लोकतंत्र भारत मे नहीं बल्कि पुरे भारतीय उपमहाद्वीप पर एक साथ फला फुला ।
ऋग्वेद में सभा और समिति का जीकर है जिसमे राजा मंत्रियो और विद्वानों से सलाह मशवरा किया करते और फैसले लेते ।
महाभारत में युधिष्ठिर बताते है की संघ या गणराज्य की शक्ति होती है उसके लोगो की एकता ,एक बार एकता टूटी तो गणराज्य का अंत ।
वैशाली के पहले राजा विशाल को भी चुनाव द्वारा चुना गया था ।
पाणिनि ने भी गणराज्यो का जीकर किया है ।
बोद्ध और जैन ग्रंथ गणराज्य का उल्लेख करते है ।
इन सबूतों के आधार पर भारतीय उपमहाद्वीप में लोकतंत्र 3000 ईसापूर्व पुराना है और अगर पुरातात्विक साबुत देखे तो 700-600 ईसापूर्व जो यूनान से पहले का ही है ।
चाणक्य अर्थशास्त्र में लिखते है की गणराज्य 2 तरह के होते है ,पहला अयुध्य गणराज्य यानि की ऐसा गणराज्य जिसमे केवल क्षत्रिय ही फैसले लेते है ,दूसरा है श्रेणी गणराज्य जिसमे हर कोई भाग ले सकता है ।
यूनानी लोकतंत्र से कई गुना बेहतर था भारतीय लोकतंत्र ।
योधेय गणराज्य में 5000 राजा होते जिन्हें लोग ही चुनते और वे राज्य सँभालते थे ,लिच्छवी गणराज्य जो नेपाल और बिहार में था वह प्राचीन काल का सबसे शक्तिशाली गणराज्य था ,उसमे 7707 राजा थे ।
कहते है की सम्राट अजातशत्रु को लिच्चावियो को हराने के लिए काफी परिश्रम करना पड़ा ।
अजातशत्रु से युद्ध से पहले लिछावियो ने सभा बुलाई थी ।
कई यूनानी इतिहासकार जो भारत आए थे वे भी गणराज्य और संघ का जीकर करते है ।

यूरोपी विद्वानों के सवाल के जवा

यूरोपियन प्राचीन भारतीय लोकतंत्र में खोट निकालते है की भारतीय लोकतंत्र पूरी तरह से लोकतंत्र नहीं ,जातिवाद के कारण हर एक को चुनाव का हक्क नहीं ।
साथ ही चुनाव आदि का उल्लेख है पर चुनाव से जुड़े लोगो के हक्को का वर्णन नहीं ।
यह कमी तो यूनानी लोकतंत्र की भी है ,क्या वह लोकतंत्र नहीं ??
यूरोपियन कई बात अनदेखी कर रहे है साथ ही जिन ग्रंथो का यूरोपियन उल्लेख कर रहे है जैसे अर्थशास्त्र और मनुस्मृति उनके कुछ भाग बाद में जोड़े गए वो भी तब जब राजतंत्र था ।
पहले बता दू की जातिवाद का प्राचीन भारत के लोकतंत्र से कोई लेना देना नहीं ।
कहते है की शाक्य गणराज्य ने कोलियो पर हमला किया था ,युद्ध से पहले सभा में बात चित हुई थी और बहुमत युद्ध को मिला ,फिर पुरे शाक्य गणराज्य में घोषणा हुई की जितने भी युवक 20 वर्ष या उससे ज्यादा उम्र वाले है वे युद्ध के लिए तैयार हो जाये ,यानि हर वर्ग या वर्ण के लोगो को युद्ध में भाग लेने के लिए कहा था ।
जब कोशल ने शाक्य गणराज्य पर हमला किया था तब भी शाक्यो ने सभा बुलाई थी ,कोशल ने सीधे कपिलवस्तु पर हमला किया था और तब हर स्त्री पुरुष ने मिलकर कोशल के सेनिको से युद्ध किया था ।
नन्द और चन्द्रगुप्त मौर्य दासीपुत्र थे पर फिर भी उन्होंने राज किया ,तब कहा गया जातिवाद ??
सिंधु नदी किनारे शूद्रक नाम का गणराज्य था जिसे महाभारत का शुद्र राज्य कहा जाता है ,उसने भी सिकंदर से युद्ध किया था ,कहा है जातिवाद ??
अग्रेय गणराज्य ने भी सिकंदर से युद्ध किया था ,कहते है यही अग्रवाल समुदाय की उत्पत्ति हुई थी और अग्रवाल बनिए होते है यानि वैश्य वर्ण से ,यानी उनका भी गणराज्य था ।
इसमें जातिवाद कहा है ??
सम्राट अशोक ने करुवाकी से शादी की थी जो मच्वारे की लड़की थी ,देवी से शादी की जो वैश्य वर्ण से थी ,अशोक ने भी वर्ण या जाती अनुसार विवाह नहीं किया था यानि उस समय जातिवाद नहीं था ।
यूनान में स्त्रियों को वोट देने का हक्क नहीं था पर भारत में था ।कलिंग को भी एक गणराज्य कहा गया है और कलिंग युद्ध के वक़्त कलिंग के लोगो ने पद्मावती को अपनी रानी चुना था ताकि वह नेतृत्व कर सके युद्ध में ,साथ में कलिंग युद्ध में स्त्रीयों ने भी भाग लिया था ।
पद्मावती भी कलिंग के सभा की सदस्य थी और उसे भी वोट देने का हक्क था ।
यूरोपियन इन तथ्यों को क्यों अनदेखा करते है ??

इन सबूतों से पता चलता है की गणराज्यो में जातिवाद नहीं था और महिलाओ को भी समान हक्क था ।

जय माँ भारती

Monday, December 9, 2013

शव जलाना या दफनाना ??( Cremation or Burials ??)

अजीब बात है मित्रो की हमें सिखाया जाता है की भारतीयों ने शवो को जलाना 1600 ईसापूर्व के करीब शुरू  किया  ,तो उससे पूर्व लोग क्या करते थे शवो के साथ ??
इस सवाल का जवाब शायद ही मिलेगा ।
सिंधु सरस्वती सभ्यता के लोग अपने शवो के साथ क्या करते थे ???
इस प्रश्न का जवाब केवल कुछ ही लोग देते है और उनकी राय है की सिंधु सरस्वती के लोग अपने शव दफनाते थे ।
मैंने इसपर शोध की और पाया की हड़प्पा नगर में 30 हज़ार लोग रहते थे और वहा केवल 100 ही कब्र मिले है ,हड़प्पा में लोग लगभग 800 वर्षो तक रहे यानि कई पीड़िया पर फिर भी केवल 100 ही कब्रे ??
तो हजारो अन्य शवो का क्या हुआ ??
इसका उत्तर कुछ समझदार व्यक्ति देते है की सिंधु सरस्वती के लोग अपने शवो को जलाते थे ,इसका सबूत यह है की लोथल में शवो को जलाने के सबूत है ।
कुछ विद्वान कहते है की भारत ,पाकिस्तान और अफगान में कई कब्रिस्तान मिले है जो सिंधु सरस्वती सभ्यता से ताल्लुक रखते है ।
हाल ही में उत्तरप्रदेश में मेरठ और बागपत जिले में कई कब्रे मिली है पर वे उत्तर हड़प्पा काल (Late Harappan Period) के है ,कुछ विद्वान मानते थे की हड़प्पा के लोग दफनाते थे बजाए जलाने ,वे असल में शवो को नगरो के पास नहीं दफनाते थे बल्कि दूर कब्रिस्तानो में दफनाते थे और बागपत में मिले कब्र असल में कब्रिस्तान थे सिंधु सरस्वती सभ्यता के ।
पर एक सवाल है जो हमेशा उठता है की सिंधु सरस्वती सभ्यता में 50 लाख तक लोग रहते थे पर इन 90 सालो में जबसे हड़प्पा की खोज हुई है तबसे काफी कम कब्र मिले है जन संख्या के अनुपात में ।
हाल ही में मोहनजोदड़ो में एक शोध से पता चला है की मोहनजोदड़ो में भी 100 के आस पास कब्र मिले है और अधिकतर शव मोहनजोदड़ो के मूल लोगो के नहीं वे आस पास के नगर ,उत्तर पाकिस्तान और ईरान आदि देशो के व्यापारियों के है ,मोहनजोदड़ो में कई कब्रों में विदेशि व्यापारियों के साथ मोहनजोदड़ो की मूल औरतों के शव मिले है जो उन व्यापारियों की पत्नीया होंगी ।
इससे साफ़ होता है की केवल 10% ही हड़प्पा के लोग खुदके शव दफनाते जो विदेशी होते और वही के मूल लोग जिन्होंने जलाने के बजाए दफ़न होना पसंद किया हो ।
कुछ विद्वान मानते है की वे शव अमीरों के होंगे ,आम आदमी अपने शव जालाते होंगे ।
अंग्रेजो द्वारा वेदों के अनुवाद से हमें पता चलता है की वेदों में दफ़नाने और शव जलाने का जीकर है ।
इससे यह पता चलता है की सिंधु सरस्वती के लोग हिन्दू थे ।
साथ ही कई कब्रे हिन्दू परंपरा अनुसार है जो उन्हें पूरी तरह से हिन्दू साबित करती है ।
लोथल में शव जलाने के सबूत बताते है की शवो को हिन्दू परंपरा अनुसार जलाया जाता था ।
बल्थल जो आहार बसन संस्कृति (Ahar Basan Culture) का भाग था वहा 2000 ईसापूर्व पुराना एक शव मिला पद्मासन में जो समाधी का सबूत है (तस्वीर देखे)
समाधी भी हिन्दू होने का सबूत है ।

तो हमें यह पता चलता है की 90% सिंधु सरस्वती सभ्यता के लोग खुदके शव जलाते वो भी हिन्दू परंपरा अनुसार ।
जिन लोगो के शव मिले है उनमे अधिकतर विदेशी व्यापारी थे ।
भारत में शव जलाने की परंपरा 7000 ईसापूर्व से शुरू होती है ।

जय माँ भारती