Wednesday, July 10, 2013

हिन्दू शब्द और उसका उदगम(Hindu word and its Origin)


इससे पहले में शुरू करू में यह बता दू की यह पोस्ट Dr Mahendra .Pahoja जी की शोध और मेरे सिधान्तो पर आधारित है |
Dr.Pahoja की शोध पड़ने के लिए यहाँ क्लिक करे

हिन्दू शब्द नाही फारसी मुसलमानों का दिया शब्द है और नाही अरबी मुसलमानों ।
हिन्दू शब्द के प्रमाण हमें 500 ईसापूर्व में अवेस्ता ग्रन्थ से मिलते है फारस में इस्लाम आने से पहले।
कुछ कहते है की हिन्दू शब्द फारसियो के गलत उच्चारण और 'स' को 'ह' बोलने की आदत से आया है ।
पर ये गलत है।
उस समय भारत की सीमा अफगान तक थी और भारत की सीमा के सबसे करीब काबुल नदी थी नाही सिन्धु,तो क्यों नहीं हमें काबुली कहा गया ??
फारसी भाषा के व्याकरण में हमें ये देखने नहीं मिलता।
फारस या वे खुदको परस बोलते उसमे भी 'स' है पर वे तो खुदको परह नहीं कहते थे ।
प्राचीन इराकी शहर सुमेर को सुमेर ही कहते थे फारसी।
प्राचीन समय में सिंध नामक एक राज्य था और उसे सिंध ही कहा गया साथ ही आज के पाकिस्तान में सिंध नाम का प्रान्त है पर उसे भी सिंध ही कहते है और यदि सिन्धु के दूसरी तरह रहने वालो को हिन्दू कहा गया तो सिंध को सिंध ही क्यों हिन्द क्यों नहीं।
यदि में कही बंधू शब्द संधू से आया तो ??
दोनों का उच्चारण एक ही है पर दोनों अलग है।
सतलज को भी सतलज कहा गया हतलज नहीं।
साथ ही जब यह सिधांत ख़त्म हो गया की फारसी 'स' को 'ह' बोलते थे तब नया सिधांत आया की विदेशी भारतीय नाम ठीक से नहीं ले सकते थे ।
पर फारसियो ने गंधार को गंधार ही कहा यानि वे भारतीय नाम ठीक से ले सकते थे।
फारस ने जब सिन्धु घाटी कब्जाया तो उन्होंने यहाँ के लोगो हिदू कहा
बाद में क्षेर्क्षेस ने के काल के लेख में हमें मिलता है
'इयम क़तागुविया ' (यह मध्य एशिया है)
'इयम गडरिया' (यह गंधर है)
'इयम हिदुविया'(यह हिन्दू है)
इन लेखो से पता चलता है की क्षेर्क्षेस या फारसियो ने पुरे भारत को हिन्द नहीं कहा क्युकी
गंधार को अलग राज्य बताया गया है ।
इस लेख की शुरुवात मध्य एशिया या कज़ाकिस्तान से होती है जो भारत के उत्तर में है फिर गंधार का नाम है जो अफगान में था और हिन्द पर ख़त्म होती है यानि हिन्द सिन्धु घाटी हो सकता है पर वेदों में सिन्धु घाटी को ब्रह्मवर्त कहा गया या तो म्लेच्छ देश साथ ही सिन्धु के किनारे रहने वालो ने खुदको कभी सिंधवी या सिन्धी नहीं कहा।
एक और बात क्षेर्क्षेस ने भले ही भारत के पंजाब तक की धरती जीती हो पर उसने खुदको आर्यावर्त महाराज कहा  पर लेखो में कही आर्यावर्त शब्द नहीं यानि जिस हिन्द की बात की गयी है वो असल में भारत ही है।
जुनागड़ में मिले अशोक के शिलालेख में भी हमें इस देश का नाम हिदा या हिन्द मिलता है और पुरे 70 बार ।
उसने इस देश को हिदा लोक कहा है ।
गौर करे तो इतिहासकारों ने कहा की ये फारसियो का दिया शब्द है यदि ऐसा है तो भारत के लोग फारसी नहीं बोलते थे तो उन्होंने अचानक ही एक फारसी शब्द कैसे अपना लिया।
अशोक ने अपने लेख मागधी में लिखवाए है और इससे साफ पता चलता है की हिन्दू भारतीय शब्द है।
साथ ही हिब्रू बाइबिल में सिन्धु को इंडो कहा गया है और भारत के लोगो को हिदो यानि हिन्दू शब्द सिन्धु से नहीं आया।
साथ ही फारस के पारसी धर्म में सरस्वती को उतना ही पूज्य मानते है जितना भारत में ,उनके अनुसार फारस की सीमा सारस्वत तक थी तो इस हिसाब से हम सरस्वती के दूसरी तरफ रहने वाले हो गए तो फारसियो को हमें सरस्वती के नाम से बुलाना चाहिए था |
पर गंधार के साथ कई अन्य राज्य थे जिनके नाम नहीं है |

अभी आप सोच रहे होंगे की यदि हिन्दू शब्द मुसलमानों,फारसियो का नहीं और ये वेदों में नहीं तो कहा से आया ?
इसके लिए मेरे 3 सिधांत है।
पहला हिन्दू शब्द अवेस्ता से पहले हित्तेती लोगो ने इस्तेमाल किया।
सरस्वती नदी सूखने के बाद भारत से यूरोप और तुर्क की तरफ 3 बड़े प्रवास हुए
पहला हित्तेती और मित्तानी जो सिन्धु घटी से तुर्क बसे 2000 ईसापूर्व में और वे खुद मानते है की वे सिन्धु से है।
दूसरा यूरोप की तरफ यूनान में 1500 ईसापूर्व में हुआ ,यूनानी भारतीयों को डोरियन कहते।
तीसरा 1000 ईसापूर्व में फिरसे यूरोप की तरफ हुआ।
अब इनमे हित्तेती और मित्तानी सबसे महत्वपूर्ण है।
हित्तेती और मित्तानी भारतीय देवी देवताओ को मानते जैसे इंद्र,वरुण और अग्नि।
हित्तेती और मित्तानी खुद कहते वे सिन्धु से आए है।
अब ये जो हित्तेती है इन्हें हित्तेतु या हित्तु भी कहा गया जो हिन्दू से मिलता है साथ ही चीनी हमें हेइन तू कहते और यह भी हित्तेती या हित्तेतु शब्द से मिलता है यानि हित्तेती खुदको हिन्दू कहते।
मेरे सिधांत अनुसार हिन्दू शब्द जम्बू से आया हो ।
जम्बू या जम्बू द्वीप भारतीय उपमहाद्वीप का संस्कृत नाम है।
ऐसा हो सकता है की जम्बू धीरे धीरे जिम्बू हुआ फिर हिन्बू फिर हिन्बू और फिर हिन्दू।
अब आप कहेंगे की फिर हिन्दू शब्द वेदों में क्यों नहीं ??
इसका जवाब भी मेरा सिधांत देगा
मेरे सिधांत अनुसार हिन्दू असल में सनातन धर्म का ही दूसरा नाम है ।
अब वेदों में आपको विष्णु या शिव शब्द नहीं मिलेंगा इसका यह अर्थ नहीं की विष्णु और शिव सनातन धर्म के देवता नहीं ।
वेदों में विष्णु के लिए नारायण शब्द इस्तेमाल हुआ है और शिव के लिए रूद्र शब्द।
इसिकादर बाद में जाकर हिन्दू शब्द का इस्तेमाल हुआ।
साथ ही आप जितने यह पोस्ट पड़ रहे है उनमे से मुस्किल से 1% ने ही वेद पड़े होंगे तो आप दावे से कैसे कह सकते है की वेद या पूरण में हिन्दू शब्द नहीं है ??
क्या आपने असली वेद पड़े है?
आज अधिकतर वेद जो बाज़ार में है वे केवल वेदों के श्लोक के अर्थ है जो आज से 90-100 वर्ष पूर्व लिखे गए थे और हमें वाही अंग्रेजो का अर्थ ही पढ़ायाजाता है।
हाल ही में पता चला है की पुरानो में हिन्दू शब्द है
यानि हमें फिरसे शोध कराना होगा।
ऐसा नहीं है की वेदों पर शोध नहीं हो रहे पर वे ठीक से नहीं हो रहे या हमसे छुपाया जा रहा है ।
अँगरेज़ और आज के मुसलमानों के चमचे इतिहासकारों ने पहले तो हमें विदेशी बता दिया फिर हमारा आत्मसम्मान गिराने के लिए एक और चाल चली।
क्युकी वेद और पुरानो के अलावा सनातन शब्द विदेशी लेख में नहीं मिलता और हिन्दू शब्द मिलता है तो हिन्दू को विदेशी बना दिया।
जय माँ भारती

Thursday, June 13, 2013

स्वस्तिक , पिरामिड और पुनर्जन्म के रहस्य (Mystery of the Swastika, Pyramids and Reincarnation)

By Aman

स्वस्तिक पूरी विश्व में प्रसिद्ध हुआ जब हिटलर ने इसे अपने झंडे पर nazi की निशानी के रूप में रखा |
इसके साथ ही स्वस्तिक को आर्य सभ्यता से जोड़ा जाने लगा और तब खोज शुरू हुई की स्वस्तिक की उपत्ति आखिर कहा हुई |
कुछ वर्ष पहले सबसे प्राचीनतम स्वस्तिक के साबुत यूरोप में विंका सभ्यता में मिले पर हाल ही में दक्षिण भारत की गुफाओ में विंका से भी पुराने साबुत मिले है जो साबित करती है की स्वस्तिक की उपत्ति भारत में हुई |

स्वस्तिक पर लेख ज्यादातर भारत मे ही मिले है ,बोद्ध धर्म के चीन और जापान में फैलने के बाद वहा भी स्वस्तिक के बारे में लिखा गया पर विदेशो में स्वस्तिक ज्यादातर केवल एक आकार भर था जिसे वे सजावट आदि के लिए इस्तेमाल करते |
स्वस्तिक को अपने देश का और इसे आर्य प्रतिक घोषित करने के लिए कई कहानियाँ बने जा रही है जैसे
यूनान या ग्रीस के लोग इन्टरनेट पर यह गलत्फैमी फैला रहे है की स्वस्तिक ज़ीउस (zeus) का प्रतिक है जबकि प्राचीन यूनान में स्वस्तिक पर कोई ऐसा लेख नहीं |
कुछ लोग कह रहे है की स्वस्तिक की उपत्ति बल्गेरिया में हुई थी
कुछ से द्रविड़ो का प्रतिक बता रहे है |
स्वस्तिक केवल आर्य प्रतिक है और आप इसके कई प्रकार अर्यो के सभ्यताओ में देख सकते है |
स्वस्तिक एक सुन्दर प्रतिक है जो नाही आर्य या किसी जाती का प्रतिक है बल्कि यह तो पुनर्जन्म और ब्रह्माण्ड के जन्म और विनाश के चक्र को दर्शाता है साथ ही यह शुभ शुरुआत का भी प्रतिक है |
निचे कुछ आर्य सभ्यताए और अर्यो के विविध धर्मो में आप स्वस्तिक पाएंगे |
स्वस्तिक के अर्थ अलग अलग सभ्यता अनुसार

Celt



प्राचीन यूरोप के celt लोगो का सूर्य चक्र या स्वस्तिक 
प्राचीन यूरोप में Celt नामक एक सभ्यता थी जो जर्मनी से इंग्लैंड तक फैली थी |उप्पर का चित्र असल में celt लोगो का स्वस्तिक है जोकि सूर्य देव का प्रतिक था |यह यूरोप के चारो मौसमो को भी दर्शाता था ,बाद में यह चक्र या स्वस्तिक ईसायत ने अपनाया और इसके बिच में येसु को लगा दिया जिससे लगता की येसु को सूली पर धिकने की प्रथा ऐसे ही शुरू हुई या सूली यही से ही ली गयी थी |


ईसायत 
येसु सूली यानि एक प्रकार के स्वस्तिक पर 
अब्रहमी धर्म वो धर्म होते है जिनमे अह्ब्रहम पैगम्बर के एक इश्वर को पूजा जाता है ,इसमें ईसायत,इस्लाम आदि धर्म आते है ,इनमे पुनर्जन्म को नहीं माना जाता पर ईसायत और कुछ अन्य अब्राह्मी धर्म पुनर्जन्म को मान्यता देते है |
अगर सबसे प्राचीन बाइबिल पड़े तो यह सामने आता है की येसु तिन दिन बाद जिन्दा होकर वापस नहीं आता और उसे सूली के साथ बताने की प्रथा बाद में आई |
मेरा मानना है की स्वस्तिक पुनर्जन्म दर्शाता है और इसीलिए येसु को स्वस्तिक या सूली के साथ दिखाया जाता है जिसका अर्थ है की येसु वापस लौटेंगे |

मिस्र और अमेरिका 
मिस्र के पिरामिड 


अमेरिका के पिरामिड 
मिस्र और अमेरिका में स्वस्तिक का काफी प्रभुत्व रहा ,इन दोनों जगह के लोगो ने पिरामिड क्यों बनाये ये कोई नहीं जनता पर यह बात पता है की मिस्र और अमेरिका के लोग पिरामिड को पुनर्जन्म  से जोड़कर देखा करते थे |
प्राचीन मिस्र में ओसिरिस को पुनर्जन्म का देवता माना जाता था और हमेशा उसे चार हाथ वाले तारे के रूप में बताते साथ ही पिरामिड को सूली लिखकर दर्शाते |


यह video देख आप समझ जायेंगे की पिरामिड असल में स्वस्तिक ही है





विडियो में आप पाएंगे की अगर आप स्वस्तिक के चारो हाथ जोड़ दे तो यह पिरामिड बनायेंग ,काफी चतुराई से मिस्र और अमेरिका के लोगो ने इसका उपयोग किया है |
आप ही सोचिये अगर पिरामिड स्वस्तिक नहीं होता तो मिस्र के लोग पिरामिड के लिए सूली या क्रॉस क्यों उपयोग करते ?

हिन्दू धर्म
मध्य से हर तरफ फैलती ब्रह्माण्ड की उर्जा 



हिंदुत्व ,जैन और बोद्ध धर्म ये तीनो ही धार्मिक धर्मो में गिने जाते है और तीनो में स्वस्तिक महत्वपूर्ण है |
स्वस्तिक एक साथ कई बातें दर्शाता है हिंदुत्व में |
यह Celt सभ्यता की तरह ही सूर्य और चार मौसम दर्शाता है |
अगर गौर करे तो यह इस ब्रह्माण्ड के फैलाव को भी दर्शाता है साथ ही ब्रह्माण्ड के जन्म को जो की शुभ है |

युगों  का चक्कर दर्शाता स्वस्तिक


स्वस्तिक युगों का चक्कर भी समझाता है |
चलिए मानले की जहा सत्य युग है वाही से शुरुआत है तो उस जगह को no. 1 दे और यदि स्वस्तिक को घुमाये तो no. 1 की जगह पर त्रेता युग आयेंगा ,इसिकादर आखिर में कलयुग और फिर विनाश ,तब फिर से ब्रह्माण्ड की उपत्ति होगी और फिर सत्य युग आयेंगा |

Sunday, May 26, 2013

ॐ प्राचीन दुनिया का World Wide Web Part 1

By Aman

जी हा आपने सही पड़ा ,ॐ था प्राचीन दुनिया का World Wide Web |
इससे पहले में बताऊ कैसे उससे पहले में आपको बता देता हु की आखिर 
World Wide Web क्या है |
अगर आप कंप्यूटर से जुड़े हुए किसी काम में है या कंप्यूटर में रूचि रखते है तो आपको पता होगा की ये क्या पर आम जनता क्या जाने |
आम भाषा में कहे तो 
World Wide Web आपको किसी भी वेबसाइट से जुड़ने में मदद करता है |ये एक प्रकार से कंप्यूटर का ही एक एप्लीकेशन मात्र है |

अभी आप सोचेंगे क्या प्राचीन काल में भारत के लोग कंप्यूटर और इन्टरनेट इस्तेमाल करते थे ?
जी नहीं पर कंप्यूटर और इन्टरनेट से कई आगे की चीज़ इस्तेमाल करते थे |
जिस कदर आप किसी वेबसाइट से जुड़ते है उसी कदर ॐ आपको किसी अन्य मनुष्य या इश्वर से जुड़ने में मदद करता है |
ॐ स्वयं ब्रह्माण्ड ही है ,इसको किसी तार का इन्टरनेट कनेक्शन की कोई जरुरत नहीं क्युकी ये पूरा ब्रह्माण्ड ही इसके लिए इन्टरनेट कनेक्शन की तरह काम्कर्ता है ,आप कही से भी इससे जुड़ सकते है चाहे वो अन्तरिक्ष हो ,कोई दूजा सौर मंडल हो या समुद्र की गहराई हो बस आपको इससे जुड़ना आना चाहिए जो हर किसी का काम नहीं |

इससे वाही जुड़ सकता है जिसके पास योगिक शक्तिया हो ,यानि हमारे योगी और साधू ,ऐसे तो कोई भी इससे जुड़ सकता है बस उस व्यक्ति को कुछ वर्षो तक योग सिख अपने 7तो चक्र खोलने होंगे |

ॐ तिन अक्षर से बनता है अ ,उ और म से ,ये तीनो ब्रह्मा , विष्णु और शिव को दर्शाते है यानि ये पूरा ब्रह्माण्ड दर्शाता है|

इसिकादर World Wide Web पुरे ब्रह्माण्ड नहीं पर पूरी पृथ्वी पर फैले वेब के लिए है |

ॐ भी तिन अक्षरों का और www भी

निचे चित्र देखे 
ॐ और world wide web में समानता 




जिस कदर आपको कोई वेबसाइट को एक्सेस करने या जुड़ने के लिए www के आगे वेबसाइट का नाम चाहिए या पूरी लिंक चाहिए उसी प्रकार हमारे ऋषियों ने प्राचीन काल में ही ॐ का उपयोग कर कई जटिल वेबसाइट बनाये जिसे आजके क्या भविष्य के कंप्यूटर भी जुड़ नहीं सकते क्युकी ये वेबसाइट जीवित लोगो के लिए है और इससे केवल वही जुड़ सकता है जिसने योगिक सिधिया हासिल करली हो |
निचे चित्र में प्राचीन वेबसाइट का एक उधारण है |
यह केवल एक उधारण है ये बताने के लिए की प्राचीनतम वेबसाइट ठीक आज के वेबसाइट की तरह ही बनाया गया था



ॐ नमः शिवाय आदि कई मंत्र  भी एक वेबसाइट की तरह ही काम करते है ,ये आपको शिव या इस ब्रह्माण्ड में अन्य किसी से भी जुड़ने में मदद कर सकते है |ये साथ ही आपकी सेहत अछि करने में भी मदद करता है क्युकी पाया गया है की ये मंत्र  आपके आसपास सकारात्मक उर्जा निर्माण करता है |
आप चाहे तो ॐ नमः शिवाय के जरिये किसी दूर के रिश्तेदार से बात करले ,आप आपना बिता कल या आने वाला कल देख सकते है ,आप इससे किसी मरीज का इलाज कर सकते है ,क्युकी ये आपको इश्वर से जुड़ने में मदद करता तो है ही साथ में एक खास प्रकार की शक्ति भी देता है |

इसका एक और फायदा है की इसमें पैसे नहीं लगते |

इनकी रफ़्तार का तो क्या कहना |यदि ॐ जुड़ जाये तो इनकी रफ़्तार प्रकाश से भी कई अधिक हो जाती है ,अब विज्ञान भी मानता है की प्रकाश सबसे तेज नहीं तो ये भी हो सकता है की ॐ या ये मन्त्र रूपी वेबसाइट सबसे तेज़ हो |
आपने साधुओ को तपस्या करते देखा ही होगा ,आखिर वे क्या करते है ?
वे इन वेबसाइट रूपी मंत्रो के जरिये इश्वर से जुड़ना चाहते है ताकि वे इन्हें वरदान दे |
ये मंत्र इश्वर तक कुछ शण में ही इश्वर से जुड़ जाते है और जबतक इश्वर प्रशन्न हो पृथ्वी तक आते है कई साल बीत जाते है ,ऐसा ब्रह्म मनुष्यों को होता है क्युकी इश्वर का लोक चाहे वो ब्रह्मा लोक हो या विष्णु ,वे इस ब्रह्माण्ड के बाहर स्थित है ,इश्वर और ॐ के लिए ये दुरी सिर्फ कुछ शण की है पर पृथ्वी के समय अनुसार कुछ सौ वर्ष लगते है |
इतने में इश्वर अपने भक्त की परीक्षा भी ले लेते है |
हम लोगो को लगता था इश्वर कितनी कठिन परीक्षा लेता पर हमारे नामस्मरण या मंत्र जाप से ही वो दौड़ा दौड़ा आता है पर इसका अर्थ ये नहीं की एक बार नाम लेकर छोड़ दिया ,कुछ मेहनत तो करो |

Note : यदि आप चाहे तो इसे अपने ब्लॉग या वेबसाइट में पोस्ट कर सकते है पर आखिर में इस blog और लेखक का नाम जरुर हो ,ये पूरी तरीके से मेरी यानि अमन की खोज है |

Sunday, May 12, 2013

महाजनपद :गणराज्य और साम्राज्य

By Aman

भारत में सरस्वती  नदी के सूखने के उपरांत लोग भारत के अनेक इलाको में प्रवास कर बसने लगे।
इनमे अधिकतर गणराज्य या राज्य होता इसीलिए इन्हें महाजनपद कहा गया क्युकी ये लोगो के प्रवास का केंद्र था|
महाजनपद असल में एक बड़े शक्तिशाली राज्य को कहते जो कई छोटे जनपदों को मिलकर बना था ,इसीलिए कई राज्यों ने साम्राज्यवाद अपनाया ताकि खुदके राज्यों को जनपद से उठाकर महाजनपद बना सके और यह उपलब्धि के 16 राज्यों को मिली |
महाजनपद का उल्लेख पहली बार पाणिनि द्वारा किया गया था ,उस वक़्त 22 महाजनपद थे और बाकि के छोटे राज्यों को जनपद कहा गया है।
पर 700 ईसापूर्व के आते आते ये केवल 16 रह गए ।
बोध और जैन में महाजनपदो का उल्लेख है पर बहोत से नाम अलग है।
इनमे मगध,गंधर ,कोसल,काशी और अवन्ती का नाम ही पाया जाता है।
600 ईसापूर्व के आते आते बिम्बिसार और अजातशत्रु  आये जिन्होंने मगध का विस्तार किया और मगध सभी जनपदों में मुख्य बन गया।
इससे पहले यह जगह काशी को प्राप्त थी।
यह वह वक़्त था जब भारत में लहे का उपयोग अधिक बड़ा और संस्कृत में प्रगति हुई।
इसी दौर में वैदिक धर्म दक्मगाने लगा और बोध धर्म का उदय हुआ।
जैन धर्म भी लोगो में काफी प्रशिध हुआ ।
निचे 16 महाजनपदो की सूचि है 700 ईसापूर्व से 300 ईसापूर्व के बिच की।
1. कुरु - मेरठ और थानेश्वर;
राजधानी इन्द्रप्रस्थ और हस्तिनापुर ।

2. पांचाल - बरेली, बदायूं
और फ़र्रुख़ाबाद;
राजधानी अहिच्छत्र तथा
कांपिल्य ।

3. शूरसेन - मथुरा के
आसपास का क्षेत्र;
राजधानी मथुरा।

4. वत्स – इलाहाबाद और
उसके आसपास; राजधानी
कौशांबी ।

5. कोशल - अवध; राजधानी
साकेत और श्रावस्ती ।

6. मल्ल – ज़िला देवरिया;
राजधानी कुशीनगर और
पावा (आधुनिक पडरौना)

7. काशी - वाराणसी;
राजधानी वाराणसी।

8. अंग - भागलपुर; राजधानी
चंपा ।

9. मगध – दक्षिण बिहार,
राजधानी राजगृह और पाटलिपुत्र (नन्द काल में )

10. वृज्जि –
ज़िला दरभंगा और
मुजफ्फरपुर; राजधानी
मिथिला, जनकपुरी और
वैशाली ।

11. चेदि - बुंदेलखंड;
राजधानी शुक्तिमती
(वर्तमान बांदा के पास)।

12. मत्स्य - जयपुर;
राजधानी विराट नगर ।

13. अश्मक – गोदावरी घाटी;
राजधानी पांडन्य ।

14. अवंति - मालवा;
राजधानी उज्जयिनी।

15. गांधार - पाकिस्तान
स्थित पश्चिमोत्तर
क्षेत्र; राजधानी
तक्षशिला ।

16. कंबोज – कदाचित
आधुनिक अफ़ग़ानिस्तान ;
राजधानी राजापुर।
भारत के सोलह महाजनपद 

700 ईसापूर्व के आते आते कई कबीलों की जनसँख्या बड़ी। ये कबीला कृषको के थे। इनमे पंचायत राज चलता था इसीलिए जब ये राज्यों के तौर पर उभरे तो गन संघ या गणराज्य आया।
राज्य से उलट इसमें जनता का राज चलता ।
वैशाली गणराज्यो में मुख्य था।
यूनान से पहले और बेहतर लोकतंत्र भारत में था।
अब बात करते है गणराज्यो और राज्यों या साम्राज्यो की।

गणराज्य  

यूनानी लोकतंत्र या गणराज्य को प्रथम क्यों माना जाता है पता नहीं पर भारतीय गणराज्य यूनान से बेहतर थे।
यूनान में आप केवल राजा चुन सकते थे बस पर भारत में बहोत से कम जनता के इशारो पर होता। बाद में गणराज्य कमजोर पड गए और जनता राज चला गया।
गणराज्यो के प्रमुख को नायक या राजा ही कहा जाता।
इनका काम कर वसूलना था और जनता के लिए सड़क आदि बनवाना था।
बहुत से गणराज्यो में गणराज्य के प्रमुख केवल व्यापारी वर्ग के होते और केवल कर वसूलते।
वैशाली  और कलिंग को छोड़ बाकि गणराज्यो में केवल चुनिन्दा वर्ग के लोग ही संघ का हिस्सा बन सकते थे।
वैशाली  और कलिंग में चारो वर्ण को इज़ाज़त थी।
वैशाली  के संघ में 7707 नायक थे।
ये गणराज्य अधिकतर वैश्य वर्ण के लोगो के थे जो ब्राह्मण द्वारा थोपे गए राजा से मुक्ति और जनता का राज्य चाहते थे |
इनकी सभा बैठती थी और हर मसले पर चर्चा होती |
जो चुंगी या कर ये लेते |
बाद में इन्होने सेना की नियुक्ति शुरू कर दी |
वैशाली या वृज्जी गणसंघ 7 गणराज्य से बना था जिसमे से कुछ के नाम ही प्राप्त है |
इनमे से एक गणराज्य शक्य था जिसकी पूरी जनता ही सेना की तरह निपूर्ण थी |
गणराज्य अपने शिष्टाचार के लिए प्रशिध थे |
अधिकतर गणराज्य या गणसंघ बोद्ध धर्मी थे और वहा बोद्ध के नियम ही चलते |
वृज्जी गणसंघ में प्राणदंड की सजा किसी बड़े अपराध पर ही मिलती |यदि देखे तो वृज्जी के गणराज्यो को छोड़ अधिक गणराज्य में कुछ अलग जी नियम थे |
मालक ,शूद्रक और कलिंग में केवल एक ही व्यक्ति चुना जाता जो राजा कहलाता और राजा की तरह ही काम करता |
वृज्जी गणसंघ ,कलिंग ,मालक ,शूद्रक और अन्य कुछ गणराज्यो की नगर प्रणाली और नगर व्यवस्था बिलकुल सरस्वती सिन्धु सभ्यता जैसी थी जो इस बात का प्रमाण देता है की गणराज्य बसने वाले सिधु घटी के थे और आर्य थे नहीं विदेशी |



आप कुछ समानताये देख सकते है सिन्धु घाटी सभ्यता और महाजनपद के सिक्को में 

सम्राट अजातशत्रु के काल में गणराज्यो का पतन शुरू हुआ |सम्राट अजातशत्रु ने 36 गणराज्यो को हराया |
मौर्य काल के आते आते के वल कुछ ही गणराज्य रह गए थे |गुप्त काल में वृज्जी के अंत के साथ भारत में गणराज्यो का अंत हुआ |महराज चन्द्रगुप्त ने वृज्जी की राजकुमारी कुमारदेवी से शादी की जिसके बाद वृज्जी एक प्रांत बनकर रह गया |वृज्जी के साथ रिश्ता काफी फायदे का पड़ा महाराज चन्द्रगुप्त क क्युकी वृज्जी के पास उस वक्त मगध का अधिक भाग था जो महाराज चन्द्रगुप्त को मिला |

साम्राज्य गणराज्य से उलट यहाँ महाराज की चलती ,साम्राज्यवादी लोग गणतांत्रिक राज्य वालो को घृणा की दृष्टी से देखते क्युकी उनके लिए गणराज्य के लोग सिर्फ लोभी होते साथ ही गणराज्यो में बोद्ध धर्म की ऐसी धूम मची की वे अधिक बोद्ध धर्म पलने लगे जिसके उपरांत हिन्दू धर्म वालो के लिए केवल साम्राज्य ही सहारा थे |
गणराज्यो में कला और विज्ञानं का उतना महत्व नहीं था जितना साम्राज्यों में थे इसीलिए जब भी भारत किसी साम्राज्य के अधीन रहता तभी कला और विज्ञान का विकास हुआ |
भारत में कई महान साम्राज्य जुए जैसे मौर्य साम्राज्य ,गुप्त साम्राज्य,शुंग साम्राज्य ,सातवाहन साम्राज्य ,विजयनगर साम्राज्य ,मराठा साम्राज्य  और कई अनेक साम्राज्य हुए |विदेशी साम्राज्यवाद से उलट न्हारत के साम्राज्यों ने नेतिकता  और धर्म का साम्राज्य खड़ा किया |
महाजनपदो कशी शुरुआत में सबसे शक्तिशाली था और कशी ने महाजनपदो में साम्राज्यवाद शुरू किया |
आखिरकार बिम्बिसार के काल में शक्ति मगध के हाथ आई ,बिम्बिसार के बाद उनके बेटे अजातशत्रु आये जिन्होंने 36 गणराज्य जीते \
मगध में कई वंश बदले और फिर आया नन्द वंश जिसके केवल दो ही राजाओ ने मगध की सीमा उत्तर में कश्मीर तक ,पूर्व में अरुणाचल प्रदेश तक ,पश्चिम में यमुना तक और दक्षिण में मध्यप्रदेश तक |

नन्द साम्राज्य 


मौर्य साम्राज्य अशोक के शाशन में 



नन्द वंश के बाद मौर्य वंश आया जिसने पुरे भरत को एक किया |चन्द्रगुप्त मौर्य पहले सम्राट थे मौर्य वंश के ,उन्होंने मगध की सीमाए अफगानिस्तान तक फैलाई ,उत्तर में आज का पूरा कश्मीर ,नेपाल ,तिब्बत के कुछ भाग थे ,दक्षिण कर्णाटक का मौर्य वंश का द्वाज लहराता था |
बिन्दुसार मौर्य  ने 16 छोटे राज्यों को जीता |बिन्दुसार के बाद उनका छोटा लड़का अशोक मौर्य सम्राट बना जिसने कलिंग जीत अखंड भारत पर राज किया |अशोक मौर्य अपनी शांतिप्रियता के लिए जाना जाता है साथ ही बोद्ध धर्म को बढावा देने की वजह से कई बोद्ध लोगो के लिए वह चहेता है |
अशोक मौर्य की मृत्यु के 50 वर्ष बाद ही मौर्य वंश समाप्त हुआ और भारत कई टुकडो में बत गया जिसे फिरसे गुप्तो ने जोड़ा |
मौर्य वंश के साथ ही महाजनपदो का युग खत्म हुआ ,मौर्य साम्राज्य के बाद सिधु नदी के किनारे कई विदेशी राज्यों ने हमला किया साथ ही भारत में कई छोटे छोटे राज्य बसे ,अब किसी को जनपद से महाजनपद नहीं बनना था क्युकी अब सबको साम्राज्य खड़ा करना था |

Wednesday, April 24, 2013

क्यों है शिव पारवती की जोड़ी सफल

By Aman
आपने लोगो को कहते सुना ही होगा की जोड़ी हो तो शिव पारवती जैसी। हिंदुत्व में शिव पारवती सफल पति पत्नी का प्रतिक है ।
पर कभी कभी मैं सोचता हु ऐसा क्यों ।
इसका उत्तर मुझे विज्ञान से मिला।
आपने वह तस्वीर तो देखि ही होगी जिसमे शिव का दाया शारीर और पारवती का बाया शारीर मिल कर एक शारीर बनता है।
यही है मेरा उत्तर।
विज्ञानं कहता है की मनुष्य के दो दिमाग होते है पर एक दुसरे से जुड़े हुए।
जिस तरफ के दिमाग का प्रभुत्व ज्यादा हो उसी के आधार पर मनुष्य का चरित्र तय होता है।
दाया दिमाग कला,साहित्य के लिए होता है। इस दिमाग के प्रभुत्व वाले आदमी को समाज का ज्यादा भय नहीं होता।वह बेखोफ होता है ।जैसे भगवन शिव ।वे प्रेतों के साथ रहते है और मानव समाज के अनुसार नहीं रहते नाही दुसरे देवताओ की तरह सज धज के।
अब बाया दिमाग गणित या विज्ञानं के लिए होता है।
इस दिमाग के प्रभुत्व वाले मनुष्य समाज अदि के अनुसार जीते है। यदि आप उन्हें कुछ बताये तो वे पहले सोच विचार के ही उसे मानेंगे।
बाया दिमाग पारवती को दर्शाता है ।पारवती शिव से उलट ज्यादा सामाजिक है। वे एक पतिव्रता स्त्री है और हर कार्य में निपूर्ण है। घर घ्राहस्ती भली बहती सभाल सकती है।
यदि आप निचे दिए गए चित्र को देखे तो शिव दाए ओर है और पारवती बाए ओर।
यदि विवाह हो रहा हो तो युवक हमेशा दाए दिमाग का हो और युवती बाए दिमाग के प्रभुत्व वाली। यही जोड़ी सर्वोतम है।
चलिए आपको आसन भाषा में समझाता हु।
यदि दो चुम्बक हो और आप उन दोनों का उत्तरी भाग या दक्षिणी भाग मिलाये तो वे एक दुसरे को धकेल देंगे।
यदि आप उत्तरी भाग और दक्षिणी भाग मिलाये तो जुड़ जायेंगे।
यही सिधांत यहाँ भी लागु होता है।
पति हमेशा दाए दिमाग का या शिव जैसा इसीलिए होना चाहिए क्युकी ऐसा व्यक्ति समाज की कभी नहीं सोचता। यदि उसकी पत्नी से गलती हो जाये और पूरा समाज ही उसके किलाफ़ हो जाये तो अगर पति को लगता है नहीं मेरी पत्नी ने कोई गुनाह नहीं किया तो वह पुरे समाज के विरुद्ध खड़े होने की ताकत रखता है अपनी पत्नी के लिए।
पत्नी बाए दिमाग या पारवती जैसी इसीलिए हो ताकि वो अपना हर कर्त्तव्य निभाए।
अब देखिये ,भगवन राम को हमेशा मर्यादा पुरसोत्तम कहा गया पर उनकी शादी ज्यादा देर न टिक सकी |
इसका कारण यह की श्री राम भी मर्यादा में रहते और माता सीता था |
अब एक जैसे व्यक्ति कहा टिक सकते है |
इसीलिए तो एक धोबी के कहने पर शररे राम ने माता सीता को छोड़ दिया |
यह असल में उस लीलाधर की ही लीला थी तक वे मानव को बता सके की पति चाहे जैसे भी हो पर भगवन शिव की तरह और समाज की न मानने वाला हो बिलकुल भगवन शिव की तरह |
आज केवल कुछ दिन साथ गुजारने और अपनी बाते मिल जाने भर से ही विवाह होने लगे है पर सब टिक नहीं पाते ,इसका यह कारण नहीं की माँ बाप की पसंद के बिना शादी करने पर ऐसा होता है इसका अर्थ है की अति और पत्नी एक दुसरे को समझ नहीं पाते |
पति पत्नी का रिश्ता तभी सफल होता है जब वे एक दुसरे को समझे .इसमें दोनों का चरित्र बड़ा काम निभाता है पर इससे ये साबित नहीं होता की केवल चरित्र से ही शादिय टिकती है ,इसके लिए जरुरी है की पति अपती एक दुसरे को समझे जैसे शिव और पारवती |

अर्धनारेश्वर 

जय माँ भारती
Note :(यह ज्ञान मुझे मेरे गुरु श्री रामचंद्र नन्द द्वारा दिया गया है और यह उन्ही की खोज है।)

Friday, April 19, 2013

हनुमान थे निएंडरथल (Neanderthal)

निएंडरथल 
By Aman
रामायण में हनुमान मुख्य किर्दारो में से एक है। कई लोग कई तर्क दे चुके है हनुमान पर,कुछ के लिए वे केवल एक मंघदत कहानी का किरदार है तो कुछ के लिए भगवन।
कई लोग कई तर्क दे चुके है की हनुमान असल  येती या हिममानव है और कुछ उन्हें परग्रही या एलियन कह चुके है।पर मुझे ये कुछ जमा नहीं इसीलिए लग गया खोज में।
मुझे मेरी शोध से  मिला की हनुमान निएंडरथल नामक मानव की एक उप प्रजाति हो सकती है ।

कहा जाता है निएंडरथल और आज के मानवो के पूर्वज आज 30 हज़ार साल पहले एक साथ रहा करते थे फिर धीरे धीरे 15000 ईसापूर्व तक वे विलुप्त हो गए।
निएंडरथल यूरोप और मध्य एशिया में रहते थे,इनका मध्य और दक्षिण भारत में रहने के सबूत भी मिले है।
ये दिखने में बन्दर जैसे थे पर मानव जैसे समझदार और मानवो से अधिक बलशाली। ये कपडा पहना करते और औजारों का उपयोग करना जानते थे।वे बोल भी सकते थे और वे मानवों की तरह ही एक साथ रहते थे |
यदि देखे तो रामायण अनुसार अंजन प्रदेश या किष्किन्धा दक्षिण भारत में ही स्थित थे |
     
निएंडरथल और हनुमान जी में समानता 
उस समय लोगो ने निएंडरथल का बंदरो से मिलता जुलता चहरा देख उन्हें वानर कहा हो ,
रामायण अनुसार वानरो और मानवों की शादी का भी उल्लेख है ,वैज्ञानिक भी मानते है की निएंडरथल और मानव मे क्रॉस ब्रीडिंग हुआ करती थी और हम में भी निएंडरथल के अंश है |

जय माँ भारती

Thursday, April 18, 2013

पश्चिमी मानव विकास की कहानी पर सवाल

यदि आप 19  वि सदी में यूरोप में किसी आदमी से मानव विकास के बारे में पूछते तो वो यही जवाब देता की हम आदम और हव्वा की संताने है ,यही कहानी मुस्लमान भी आपको बताते और यहूदी भी।
आज जब Evolution का सिधांत सामने आया है फिर भी कई लोग आदम और हव्वा की कहानी पर विश्वास रखते है जो की केवल एक मनघडंत कहानी है।
विग्यानुसार मनुष्य केवल एक स्त्री पुरुष से नहीं आ सकता कम से कम आदिमानवो 10 हज़ार की संताने है आज के मनुष्य।
यदि हम आदम और हव्वा की संतान होते तो अपने भाई बहन से शादी कर हम अपना DNA नस्त कर कबके विलुप्त हो गए होते।
चलिए जरा आदम और हव्वा की कहानी पर गौर फरमाते है साथ ही इसके साथ उठते सवालो के जवाब भी देंगे।
आदम और हव्वा की कहानी शुरू होती है  इसराइल के देवता Yehweh की दुनिया की रचना के बाद ।इश्वर पृथ्वी पर 'Eden Garden ' नाम का बाग़ बनाते  है जिसे चार नदिया बाटती  वे नदिया है टिगरिस ,यूफ्रातेस,पिशों और गिहों।
आज टिगरिस और यूफ्रातेस का अस्तित्व है। ये दोनों नदिया आज के इराक में बहती है बाकि दोनों नदिया आजतक नहीं मिली।
यही वजह है की विदेशी जो इसाई, म्मुसलमन और यहूदी है वे इराक को ही सबसे पुराणी सभ्यता बनते है इस सच्चाई को नकार की भारतीय सभ्यता सबसे पुराणी है।
यहाँ इश्वर आदम को बनाते है फिर उसकी फस्लियो से हव्वा को। इश्वर इस दुनिया के हर प्राणी को आदम के पास लाता है  और उनका नामकरण करने कहता है।
कम्करण केबाद इश्वर आदम को कहता है की अब से ये बाग़ तुम्हारा तुम कौनसा भी फल खा सकते हो और किसी भी जानवर का मास खा सकते हो पर याद रखना की ज्ञान के फल  वाले पेड़ का फल न खाना वरना तुम अमृतवा खो दोंगे साथ ही अच्व्हे बुरे की समाज पा लोंगे जिस कारन तुम इस बाग़ में नहीं रह पोंगे।
बाइबिल,कुरान और तोर्रें में साफ़ लिखा है की इश्वर दर गया की फल खाने के बाद वह सब जान जायेंगा और इश्वर की जगह ले लेंगा इसीलिए इश्वर आदम को फल खाने से रोकता है।
ऐसे ही कई दिन बिट गए ।एक साप जो की सैतान था वो हव्वा को अपनी बातो में फसा लेता की फल खालो ।
यहाँ भी लिखा है की केवल औरत जात ही है जो दुसरो की बातो में फसती है।पुरुष कभी नहीं फास्ता।
सैतान की बात मान हव्वा फल खा लेती है और उसकी देख हव्वा भी ।
हव्वा को इस बात के लिए खूब कोस जाता है और इस दुनिया में बुरे लाने वाली खा जाता है।
यह बात जान की आदम ने फल खा लिया इश्वर उन दोनों को बाग़ से निकल देता है।
अब आदम और हव्वा अमृतवा खोने के करे इश्वर से गुहार लगते है।
तरस खाकर इश्वर कहता है की मेरा बेटा मानव बन जन्म लेगा जो तुम्हारे कास्ट दूर करेगा ।
इसाई उस बेटे को ईसा कहते है ,मुस्लमान उसे मुहम्मद और यहूदी उसे मूसा कहते है।
अब इससे कई प्रस्न आते है ।

प्र 1 यदि Yehweh जानता था की आदम फल खायेंग तो अनर्थ हो जायेंगा तो ऐसा पेड बनाया ही क्यों और बनाया तो उसे उस बाग़ में क्यों लगाया ?
उ . क्युकी नहीं Yehweh था या कोई और ये केवल एक मंघदत कहानी है।

प्र 2 यदि फल खाने के बाद ही मानव में समझ आती तो मानव कैसे जीवित था।
उ . ये केवल बकवास है।

प्र 3 यदि हव्वा या औरत दुसरो की बातो में जल्दी फस जाती है और आदम या मर्द नहीं तो हव्वा के पीछे आदम ने भी फल क्यों खाया।
उ. ये झूठ है की केवल औरत ही दुसरो की बातो में जल्दी फसती है ताकि औरतो को दबाकर रखा जाये आपने हाथो के निचे।

प्र 4 यदि वो इश्वर का बेटा ईसा, मुहम्मद या मूसा है तो अबतक लोग अमर क्यों नहीं हुए और उनके कस्त क्यों दूर नहीं हुए।
उ. क्युकी ये सब झूठ है।

प्र5 यदि हव्वा ने फल खा कर मानव को ज्ञान और समझ दी तो उसे पहला पैगम्बर कहना चाहिए न ही आदम को ?
उ. ये धर्म केवल पुरुष प्रधान है इसीलिए ये उमीद छोड़ दो।
ये थी मानव विकास की झूठी कहानी  जो की केवल अन्धविश्वास है ताकि लोगो को मस्सिहा का झासा दे उनसे मन चाह काम कराया जाये।

जय माँ भारती

Sunday, April 14, 2013

अमेज़न महिला हत्यारानो का राज्य

By Dev (Blog Writer)

इतिहास उठाकर देखले आज तक जितने राज्य साम्राज्य हुए उनमे अधिकतर पुरुष प्रधान राज्य थे पर कुछ ही थे जिन्हें महिलाये चलती थी।
इन्ही में से एक ऐसा राज्य था जो आज के तुर्क से लेकर साका (Synthia) तक था।
इनकी रानी महिला तो थी ही पर पूरी फ़ौज ही हसींन महिला हत्यारानिनो की थी जिनकी तलवारे पुरुषो के रक्त के लिए प्यासी थी।
ये थी अमेज़न राज्य की महिला योध्याये जिनका जीकर अक्सर यूनानी मिथकों और कहानियो में मिलता है।
यूनानी में अमेज़न का अर्थ है योधा ।
इन लड़ाकू महिलाओ के बारे में यूनानी लिखते है की ये अप्सराओ सी सुन्दर पर पुरुषो सी तलवार चलाती थी इसीलिए यूनानी उन्हें Androktones कहते यानि पुरुषो को मरने वाली।
इनका जीकर यूनानी महागाथा Iliad में भी है साथ ही जब सको का आक्रमण हुआ था भारत पर तो साका योद्धओ के साथ महिला योद्धाओ का भी उल्लेख है।
अमेज़न यु तो स्वतंत्र तरीके से युद्ध लड़ता या किसी के सहायक राज्य के तौर पर भी।
इनके समाज में केवल औरते ही होती ,पुरुष केवल नौकर होते उनका कोई औदा नहीं था उनके समाज में।
महिलाये खेती,शिकार आदि जैसे अनेक कामे करती।
अपना वंश बनाये रखने हेतु  वर्ष में केवल एक बार ये पास के कबीलों में जाकर पुरुषो  से सम्भोग करती और यदि लड़का होता तो उसे मार दिया जाता या अपने पिता के पास भेज देते या फिर उन्हें कुछ वर्ष पलकर जंगले में छोड़ देती।
लडकियों को वे अपने पास रखती और हर काम सिखाती।
युद्ध के दौरान जिन पुरुषो को बंधी बनाया जाता उन्हें ये अपने नौकर के तौर पर रख लेती। ये उनका काम करते या फिर मनोरजन करते। कियो को सम्भोग हेतु भी रखा जाता।
कई सालो तक इनके अस्तित्व पर शक किया जाता पर हाल ही में तुर्क और यूक्रेन में कुछ कब्र मिले है महिला योधो के जो इनके सच्चाई पर मोहर लगाती है।
उस वक़्त पुरुषो के लिए तो अमेज़न नर्क के बराबर ही होगा।
आज की महिलाओ को इन औरतो से बहादुरी की सिख लेनी चाहिए की कैसे अपनी रक्षा की जाये और समाज में महिलाओ को आगे लाया जाये।
जय माँ भारती
Note(अश्लील सब्दो का प्रयोग करने के लिए कृपया शमा करे)

Saturday, April 13, 2013

काब्बा के काले पत्थर का राज़ और आल्हा की सचाई।

By Aman and Dev ( Blog Writers)

यु तो मेने कई बार मुसलमानों को यह कहते सुना है की पत्थर की पूजा हराम है। पर जब में इनसे पूछता हु की काब्बा में जो काला पत्थर है उसकी पूजा क्यों करते हो तुम ?
कई जवाब नहीं दे पाते और कुछ बोलते है ये पत्थर पैग़म्बर आदम के ज़माने का है ,वे पहले आदमी थे और पैगम्बर इसीलिए हम उनकी याद में इसकी पूजा करते है।
कई तो पूजा करने की बात नहीं करते पर बोलते है की ये अल्लहा की दें है इसीलिए हम चक्कर कटते है इसकी,इससे हमें उर्जा मिलती है पर हम इसकी पूजा नहीं करते।
मुझे और मेरे साथी देव को ये बात पति नहीं इसीलिए हमने छानबीन की और एक राज़ सामने आया जिसे आजतक छुपाये रखा गया।
ये छानबीन दो भाग की है एक मेरा और मेटे मित्र देव की है।

काल पत्थर अल्लह की दें नहीं ( Aman)

मेने काले पत्थर पर कई तर्क सुन रखे थे जैसे ये शिव लिंग है या शनि देव की मूर्ति पर मुझे ये पसंद नहीं आया और यदि वो लिंग है तो उसके साथ योनि होनी चाहिए जो की है नहीं साथ ही शनि देव की मूर्ति तो कतए नहीं क्युकी ये कुछ गोल सी है और शनि देव की मूर्ति तो विशाल चौकोणं होती है ।
तो ये है क्या ?
ये असल में एक उल्का है जो मुहम्मद के जन्म के कई सौ साल पहले अरब में गिरा  था।
600 ई. से पहले यानि इस्लाम से पहले अरब के लोग कुदरत की पूजा करते थे।
ये लोग बंजारे हुआ करते थे और इनके हर काबिले का एक कुल देव होता था।
मक्का और  मदीना उस वक़्त भी अरब के मुख्या शहर थे।
अरबियो के भी कई देवता थे जिसमे मुख्या था चन्द्र देवता इलाह जिसके बारे में आपको देव बतायेंगा।
कुरान में इस  धर्म का जीकर है की इस धर्म के लोग अंध श्रद्धालु थे ,वे पेड़ो को पूजते थे और आमिर सौदागरों को भी ,कुरान अनुसार  आमिर सौदागर अपनी मूर्तिय बनवाते और खुदको भगवन कहते ।
पर अब तक इस बात के सबूत नहीं मिले।
हां वे पैडो की पूजा करते पर मानव की तो बिलकुल नहीं।
पुरातत्व वैज्ञानिको को केवल अभी तक प्राचीन अरब धर्म के देवताओ की मूर्ति मिली है ।अब तक ऐसी नहीं मिली जो सौदागर की है।
पर देखे तो मुहम्मद भी आमिर सौदागर था क्या पता उसने कुरान में उल्लेख कार्य किया हो ?और खुद के बजाये अल्लह नाम का इश्वर बनाया हो।
खैर अब असली बात पर आते है।
जब वह उल्का मेक्का शहर में गिरा  तो सब ने उसे चन्द्र देव इलाह की देन समझी ।
ये लोग इस उल्का की पूजा करने लगे ताकि उन्हें बरकत मिले पर मुहम्मद ने प्राचीन अरब धर्म के सारे के सारे मंदिर तुडवा दिए और बंद करवा दिए तो केवल इसे ही क्यों बक्शा ?
ये आपको देव बतायेंग।

मुहम्मद का पाखंड और पत्थर की सचाई (Dev)

जैसा आपको अमन ने बताया की प्राचीन अरबी उस उल्का को चन्द्र देव की देन समझ पूजा जाता तो इस्लाम में इसे इतना महत्व क्यों है ।
इसका उत्तर है की मुहम्मद एक क्रूर और अत्याचारी आमिर सौदागर था।
वह भी प्राचीन अरबी धर्म को मानता था।
उसके अनेक रिश्तेदार अनेक धर्म का पालन करते।कोई इसाई ,कोई यहूदी यहातक की एक रिश्तेदार को हिन्दू तक कहा गया है।
जिन सौदागरों का उल्लेख कुरान में है वो असल में है ही नहीं बल्कि वह सौदागर खुद मुहम्मद था।
मुहम्मद की क्रूरता को छुपाये रखने हेतु इन सौदागरों की कहानी रची गयी।
मुहम्मद प्राचीन अरबी धर्म के इलाह देवता का भक्त था ।वह मानता की केवल इलाह ही इश्वर है और कोई नहीं और यही इलाह  बाद में जाकर अल्लह बना।
क्युकी वह पत्थर इलाह यानि अल्लह की दें थी करके इस्लाम में उसे पूजने की इज़ाज़त है। रही बात इलाह के मंदिर की तो वो भी उसने नस्त कर दिए क्युकी  वह इलाह का वजूद मिटाकर केवल अल्लह का वजूद चाहता था।
मुहम्मद ने अपनी अमीरी के दम पर मेक्का कब्जाया फिर तो आप जानते ही है।
इलाह की मूर्ति की तस्वीर निचे दी गयी है

जय माँ भारती

Thursday, April 11, 2013

शुन्य की खोज असम में हुई।

By Aman and Vikramaditya

यूनानी और रोमन यूरोप को कई महान अविष्कार देने के लिए महसूर है। यूनान ने डेमोक्रेसी दी तो रोम ने नालियों और सोचालय व्यवस्ता दी।
पर फिर भी ये देश शुन्य की खोज में असफल रहे।
जब शून्य पहली यूनान और रोम पंहुचा तो उन लोगो ने कहा की कैसे कोई वास्तु न होकर भी हो सकती है?
अब आप सोचेंगे की ये तो भारत के महान गनित्याग्य अर्याभात्त थी जिन्होंने कुछ नहीं को कुछ है कहा पर सच यह है की शुन्य की खोज अर्याभात्त से पहले असाम में हो चुकी थी।
हाल ही में असाम में एक पत्थर पर कुछ अंक अंकित मिले है जो 200 ई. के है यानि अर्याभात्त के 300 वर्ष पूर्व।
वे अंक है 2,3,1,0,7 और 8।
डॉ एच.एन भुयान जो की प्रशिध पुरातत्व वैज्ञानिक है इस बात की पुस्ती की है।
अभी जाच चल रही है उस आदमी के बारे में पता करने की जिसने शुन्य की खोज की।

आदिवासी भी आर्य है।

By Dev (CO-WRITER)

आदिवासी उन्हें कहा जाता है जो आदिकालीन ज़माने की तरह रहते थे। भारत में आज भी आदिवासी है बहोत से जंगले में रहते है और बहोत से नगरो ,छोटे शहरों में बस गए है ।
यदि वेद का अध्यन करे तो कई आदिवासी कबीलों को क्षत्रिय मन गया है।
यदि असज देखे तो राजनीती और वोट हेतु इन्हें निचली जात का बताया जाता है और वोट पाया जाता है।
आर्य आक्रमण की थ्योरी के अनुसार आदिवासी भारत के असली मूलनिवासी है साथ ही दलित भी इन्ही के साथ है। पर ये सरासर झूठ है।
रामायण और महाभारत में भील आदि को क्षत्रिय कहा गया है।
गोंड के राजवंश ने मध्यप्रदेश में राज भी किया है।
इन्हें हमसे अलग करती है इनका रहन सहन क्युकी ये विकशित आर्यों के उलट अपनी परंपरा के अनुसार रहना चाहते है।
यदि धर्म देखा जाये तो कई हिन्दू है ,कई मुस्लिम और इसाई पर पहले ये हिन्दू थे।
इस बात को भी नकार दिया जाता है क्युकी आदिवासी अपने पूर्वज और पदों की पूजा करते है।
यदि देखे तो वेदो में अपने पूर्वज और पेड़ो की पूजा को सम्मानित स्थान है ।साथ ही आज भी कई आदिवासी भगवन शिव और नाग की पूजा करते है।
DNA शोध से पता चला है की आदिवासी भी भारतीय है ब्राह्मण या शुद्र के ही परिवार से।
यदि वेदों में देखे तो हमें ये भी पता चलता है की आदिवासी और हम एक ही है। वो इस कदर है की जब मानव धरती पर फ़ैल गए तो उन्होंने सर्वप्रथम अपने अपने काबिले बनाये। धीरे धीरे ये छोटे छोटे काबिले बड़े हो बड़े काबिले बने फिर राज्य बन गए।
कुछ काबिले ही रहे।
इसका प्रमाण दसराजन युद्ध में है। इस युद्ध में राजाओं के साथ कई कबीलों के सरदार भी थे।

Wednesday, April 10, 2013

सिन्धु सरस्वती सभ्यता का पतन।

By Aman (Blog Writer)

थोड़ी जानकारी

सिन्धु सरस्वती सभ्यता सिन्धु नदी और सरस्वती नदी के बिच में बसी सभ्यता थी। ये अफगानिस्तान से भारत तक फैली दुनिया की सबसे बड़ी सभ्यता थी।
आज आधे भारत या पाकिस्तान से भी बड़ी जगह में ये सभ्यता भारत में फैली थी ।
यु तो पुरातत्व वैज्ञानिक कहते है ये सभ्यता 6000 ईसापूर्व में बसी और इसने 3000 ईसापूर्व में इसने अपना स्वर्ण युग देखा पर 1900 ईसापूर्व के आते ही इसका पतन शुरू हो गया।
पर यही शोध से पता चला है की ये सभ्यता 9000 ईसापूर्व में बसी और इसका स्वर्ण युग 5000 ईसापूर्व से 1900  ईसापूर्व तक था।
ये द्दुनिया की सबसे पुराणी सभ्यता है पर विदेशी इसे नकारते हुए मेसोपोटामिया (5000- 300 ईसापूर्व) को सबसे प्राचीन बताते है वो भी केवल इस तर्क पर की मेसोपोटामिया ने खुदके सभ्यता की तारिक लिखी थी जो 10000 ईसापूर्व तक जाती है। पर कुछ भी हो सरस्वती सभ्यता सबसे प्राचीन है।
इस सभ्यता के व्यापर मिस्र(केमेथ मिर्स का असली नाम है) मेसोपोटामिया,दक्षिण भारतीय सभ्यता ,अफगान अदि से था।
जब मेसोपोटामिया और केमेथ(मिस्र) में आलीशान घर बनाना शुरू हुआ था तब  सरस्वती सभ्यता के नगरो में उस वक़्त के पहले महानगर थे।
यूरोपियन सभ्यता में रोम सभ्यता ही थी जोसने नाले उपयोग उससे पहले सरस्वती सभ्यता थी जो अपने नालो,मोरियो और स्वच्चाता के लिए महासुर थे ।
सरस्वती सभ्यता के हर नगर में हर घर में सोचालय थे जबकि मेसोपोटामिया और केमेथ बड़ी बड़ी इमारतो का निर्माण कर रहे थे फिर भी उनके घरो में यहाँ तक की रजा के महल में भी सोचालय की सुविधा नहीं थी।
यही सभ्यता थी जिसने पहली बार लिखना शुरू किया मेसोपोटामिया से 100 वर्ष पहले साथ ही पहली भासा भी विकशित यही हुई।
सर्जरी,दातके इलाज के तरीके ,वजन ,बटन  अदि कई वसतो यही की दें है।
दुनिया का पहला बंदरगाह लोथल में है।

पतन

इस सभ्यता के पतन की पहली सबको तब से गुथी में दल रही है जबसे इसकी खोज हुई थी।
1900 में धीरे धीरे लोग यहाँ के नगर छोड़ जाने लगे पर उसके बाद भी कई नगर बनाये गए जो लेट हरप्पा के समय के है ।ये नए नगर लोगो को केवल कुछ 500 से अधिक वर्ष ही रोक पाए।
200 ईसापूर्व तक यहाँ लोग बचे हुए थे।यहाँ कुषाण वंस का एक स्तम्ब मिला जो ये बताता है की कुषाण के समय भी यहाँ लोग थे पर बाद में ये नगर पूरी तरह खली हो गए।
इसके बाद केवल विदेशी आक्रमणकारी ही यहाँ बसे।
हड़प्पा अदि शुरवाती नगरो की टूटी फूटी हालत देख लोगो ने अंदाजा लगाया की किसी विदेशी अक्रमंकरियो ने इन पर हमला किया। तब ज्यादातर पुरातत्व वैज्ञानिक इसाई थे।
उनकी मान्यता थी की इस्वर ने दुनिया 4000 ईसापूर्व में बनाई ,2000 ईसापूर्व में बाड़ आई जिसके बाद ये सभ्यता बसी यानि 1500 ईसापूर्व के करीब अक्रमंकरियो ने यहाँ हमला किया।
हिटलर वेदों में कहे गए सर्वोच्च आदमी आर्य से बहोत प्रवाहित था इसीलिए उसने घोसना की की वह और सारे जर्मन आर्य नस्ल के है।
फिर क्या था पुरातत्व वैज्ञानिको ने कह दिया की विदेशी अर्यो ने सरस्वती सभ्यता का अंत किया। साथ ही अंगेजो के लिए हिन्दुओ को बटने का अच्छा तरीका था ये इसीलिए इसे मान्यता दे दी गई।
पर 1990 के करीब करीब इस तर्क को लोग अभी नकारना शुरू कर रहे है।
ये कैसे हो सकता है की कुछ हज़ार विदेशी 5 लाख की जनसँख्या वाली सभ्यता पर कब्ज़ा करे। इसका तर्क ये दिया गया की सरस्वती सभ्यता के लोग शांति प्रिय थे और हटिया का इस्तेमाल नहीं करते थे वे पर यह तर्क 2005 के करीब टूट गया जब उत्तरप्रदेश में सरस्वती संह्यता के लोगो की कब्रे मिली जोसमे तलवार,कवच सही धनुष भी मिले यानि ये लोग शत्र रखा करते थे।
जल्द ही एक नया तर्क आया की 1900 के करीब मेसोपोटामिया मसे व्यापर टूटने के करे यह सभ्यता विलुप्त हो गयी पर जल्द ही इसे भी नकार दिया गया क्युकी व्यापर हेतु कई देश थे सरस्वती सभ्यता के पास।
अगला तर्क जिसे में भी मानता हु वो है जल वायु में बदलाव।
जल वायु के बदलाव के कारन 1900 के आखिर में वह वर्षा कम पड़ने लगी इसके साबुत है पुरातत्व वैज्ञानिको के पास। साथ ही सरस्वती नदी का सुखना। सरस्वती नदी के सूखने के कारन उनकी उद्पदन शमता कम हो गयी पर किसी कदर सिन्धु की सहयता से वे टिके रहे।
बाड़ भी एक कारन है। सरस्वती सभ्यता के कई नगरो में कई बार बाद अस्यी थी। मोहनजोदड़ो में ही कुल 7 बार बाड़ आई थी। मेसोपोटामिया की तरह बाद से बचने के अछे उपाय न हिने के कारन ये सभ्यता विलुप्ति के कगार तक आ पहुची थी।
अराजकता और भ्रस्ताचार ये तर्क मेरा स्वयं का है ।
मेने पाया की मोहनजोदड़ो अदि नगरो की बाद से बचने के लिए दीवारों को बहोत सलिखे से बनाया गया था ।पर जैसे जैसे बाड़ आती गयी वैसे वैसे दिवार की गुणवक्ता घटती गयी ।ये बात पुरातत्व वैज्ञानिको ने भी पी है।
साफ़ है वह का राजा या जनता जिन्हें दिवार की मराम्मद कम सोंपा जाता वे उसमे घोटाले करने लगे।
यदि लेट हड़प्पा के नगर देखे तो ये साफ़ ज़ाहिर होता है की वे नगर केवल लोगो को कुछ साल रोके रखने के लिए ही बने थे यानि जनता ने राजा के विरुद्ध बगावत छेद दी थी और साथ ही इसी दौरान फारस ने सिधु घटी पर आक्रमण करना शुरू कर दिया  था। उन्ही से बचने और नए राज्य के निर्माण के लिए घाटी छोड़ दूसरी जगह बसे।

नतीजा

नतीजा साफ़ है ब्रस्ताचार और बाड़ की वजह से सरस्वती सभ्यता के लोग भारत में फ़ैल गए फिर इन्ही लोगो ने जनता के राज के लिए जनपद बनाये जो बाद में महाजनपद बने।
यही आप सिन्धु सभ्यता की मुद्रा और महाजनपद की मुद्रा मिलाये तो आपको कई समानताये मिलेंगी यानि सरस्वती सभ्यता विलुप्त नहीं पर अभी भी जरी है।
जय माँ भारती