Friday, March 7, 2014

हिंदू धर्म की पुनः स्थापना (Re-establishment of Hinduism)

सम्राट अशोक के बोद्ध धर्म अपनाने के बाद पूरा उत्तर भारत बोद्ध बन गया और मौर्य कालीन नगरो में मथुरा बोद्ध शिक्षा का प्रमुख केंद्र बन गया था ।
तक़रीबन 500 वर्ष तक वह बोद्ध केंद्र बना रहा ,हा कुछ काल के लिए शुंग वंश का राज रहा मथुरा में , पर शुंग राजा धर्मनिरपेक्ष थे ।
अशोक के काल से पहले मथुरा वैदिक धर्म का केंद्र था जिसकी पुष्टि हिंदू ग्रंथ करते है ।
मेगास्ठेनेस जो यूनानी लेखक था और चंद्रगुप्त मौर्य के काल में भारत आया था ,वह लिखता की  मथुरा में 'हेराकल्स' नाम के देवता की पूजा होती है और हेराकल्स श्री कृष्ण का यूनानी नाम है ।
मौर्य,ग्रेसो बक्ट्रिया ,शक , हिंद पार्थिया और कुषाण यह बोद्ध वंश थे जो मथुरा पर राज करते थे ।
कुषाणों ने नागवंशियो को अपना सामंत नियुक्त किया और कुषाणों के पतन के वक़्त यह नागवंशी स्वतंत्र हुए और मथुरा पर इन्होने राज किया ।
यह नागवंशी भारशिव कहलाये और ये शिव भक्त थे ,वाकातक ताम्र पत्र अनुसार भारशिवो ने खुदको गंगा के पवित्र जल से शुद्ध किया था और काशी में 10 अश्वमेध यज्ञ किये थे ।
वायु पुराण अनुसार 7 नागवंशी पाटलिपुत्र पर राज करेंगे गुप्ताओ से पहले ।
पुष्यमित्र शुंग के बाद भारशिवो ने अश्वमेध यज्ञ किया जो बोद्ध राज में बंद हो गया था ।
भारशिवो ने मथुरा को राजधानी बनाई थी और फिर धीरे धीरे अपने पडोसी राज्यों को जीतते गए जो बोद्ध बन गए थे ।
भारशिव वंश के पहले राजा वीरसेन के सिक्के पंजाब और उत्तर प्रदेश में मिलते है और उनमे लक्ष्मी और नंदी की तस्वीर है ।
कुछ इतिहासकारों के अनुसार वीरसेन नागवंशी नहीं था साथ ही भारशिव राजाओ के नामो पर भी विवाद है क्युकी भारशिवो के कई सिक्को पर राजाओ के नाम स्पष्ट नहीं नज़र आते साथ ही विष्णु पुराण अनुसार मथुरा ,पद्मावती (आज के ग्वालियर में ) और कांतिपुर ( आज के मिर्ज़ापुर में ) 9 नागवंशी राजा राज करेंगे
हमें पद्मावती में 9 नाग राजाओ के सिक्के मिलते है जो और विवाद खड़ा करता है ।
पर वीरसेन के सिक्को और वायु पुराण अनुसार मैंने भारशिवो के साम्राज्य का नक्षा बनाया है जो पूरी गंगा घाटी में फैला था ।
न केवल मथुरा बल्कि पाटलिपुत्र को भी भारशिवो ने यूनानी बोद्ध राजाओ से आजाद कराया था ।
कुषाणों के यूनानी सामंत कुषाण वंश के पतन के बाद भी वहा राज कर रहे थे पर भारशिवो ने उन्हें भी परास्त किया ।
भारशिवो के बाद गुप्त वंश का राज आया ,वे भी वैदिक थे पर हर धर्म का सम्मान करते थे ।
समुद्र गुप्त और चंद्र गुप्त (द्वितीय) के अधीन गुप्त साम्राज्य ने पुरे भारत में हिंदू धर्म फैलाया ।
उनकी निति धर्म विजय की थी जिसके अनुसार वे किसी राज्य को जीतते पर उसे स्वतंत्र करते लेकिन कर या टैक्स लेते है ,और यदि समुद्र गुप्त और चंद्र गुप्त धर्मविजय का मार्ग न अपनाते तो उनका साम्राज्य मौर्य साम्राज्य से भी बड़ा होता ।
पर स्कंद गुप्त के बाद जो गुप्त राजा हुए उन्होंने बोद्ध धर्म अपना लिया था ,लेकिन उन गुप्त राजाओ का राज्य केवल बिहार और बुंदेलखंड तक ही था ,साथ ही यशोधर्म ,राष्ट्रकूट आदि कई बड़े हिंदू राजा अपना प्रभुत्व कायम कर चुके थे गुप्त काल के अंतिम दिनों में ।
दक्षिण में भी बोद्ध धर्म अपने पैर जमा चूका था कलाभ्रस के राज में ।
300 इसवी तक दक्षिण पर चोल,चेर और पांड्यन वंश राज करते थे पर तब कलाभ्रस वंश का उदय हुआ जिसने इन दिनों वंश को अपने अधीन कर लिया ।
कलाभ्रस बोध थे और दक्षिण के हिंदू राजाओ द्वारा ब्राह्मणों को मिली जमीं उन्होंने छीन ली थी वो भी जबरन जो की सही नहीं था क्युकी किसी की जमीं छीन लेना गलत है ।
नेदुजदैयन नाम के पांड्यन वंश के एक अभिलेख से इसकी पुष्टि होती है ।
कलाभ्रस के अंतिम राजा हिंदू बन गए और दुबारा चोल,चेरा और पांड्यन वंश उदय हुआ और दक्षिण में फिरसे हिंदू राज आया ।

जय माँ भारती

Saturday, February 8, 2014

वैशाली का युद्ध ( Battle of Vaishali )

{{ज्ञानसन्दूक युद्ध
काल = 490 ईसापूर्व।
स्थल = गंगा घाटी और वैशाली।
सेना = दोनों सेना के पास लगभग समान संख्या है सेना की ।शायद बड़ा चड़ाकर पेश किया है ,दोनों सेना के पास 1 लाख के करीब सेना होगी पर फिर भी जैन ग्रंथ में दिए अकड़े देखते है ।
57000 हाथी दोनों सेना के पास
57000 घोड़े दोनों ही सेना के पास
57000 रथ दोनों ही सेना के पास
और 5 लाख 70 हज़ार सेनिक दोनों ही सेना के पास ।

सेना का नेतृत्व :-
मगध राज्य
अजातशत्रु
10 कलाकुमार
वस्सकर

णसंघ
चेतक
विरुधक
मनुदेव

युद्ध का परिणाम :-
अजातशत्रु की वैशाली,मल्ल ,काशी,कोसल आदि राज्यों पर जीत ।

वैशाली का युद्ध या जैन ग्रंथो में इसे महासिलाकंताका कहा गया है । भारत के इतिहास में यह युद्ध काफी महत्त्व रखता है क्युकी इस युद्ध में अजातशत्रु ने तलवार वाले रथ ,गुलेल और झूलने वाली गदा का उपयोग पहली बार किया था ।इस युद्ध ने मगध की सीमाए दूर दूर तक फैलाई ।
जैन ग्रंथो में इस युद्ध की वजह हल्ला और विहल्ला कुमार को बिम्बिसार के दिए तोफे कहे गए है जो की एक हीरे का हार था और सेचानक नाम का हाथी था ,अजातशत्रु सम्राट बन गया और तब अजातशत्रु ने हल्ला और विहल्ला को वे तोफे उसे देने को कहा पर दोनों राजकुमारों ने मना कर दिया और अपने नाना चेतक के पास गए जो वैशाली के राजा थे ,अजातशत्रु ने राजा चेतक को उन दोनों कुमारो को उसे सोपने को कहा पर चेतक ने मना कर दिया ,इसीलिए यह युद्ध हुआ ।
बोध ग्रंथ अनुसार इस युद्ध का कारन हीरो की खदान पर अधिकार को लेकर था ।
यदि इन दोनों बातो को को सही माने और इन्हें जोड़े तो यह बात सामने आती है की हीरो की खदान अजातशत्रु को चाहिए थी पर क्युकी मगध और वैशाली के पारिवारिक संबंध थे इसीलिए अजातशत्रु कुछ नहीं कर पाया पर जब हल्ला और विहल्ला ने वैशाली में शरण ली तब उसे एक अच्छा मौका मिल गया और फिर युद्ध शुरू हुआ ।

युद्ध :-
अजातशत्रु ने अपने प्रधान मंत्री वस्सकर और अपने सोतेले भाइ कालकुमारो के साथ युद्ध की रणनीति बनाना शुरू की  । अजातशत्रु जानता था की वैशाली पर पहले भी हमले हुए है और वैशाली अबतक नहीं हारा इसीलिए उसने काफी बड़ी सेना जमा की ।
मगध इरादा था गंगा घाटी के मैदानों का लाभ उठाना और इसके लिए इस युद्ध में अजातशत्रु ने हाथी,रथ और घोड़े उतारे।
यही निति वैशाली की भी थी ,वैशाली मगध के मुकाबले छोटा था इसीलिए उसने 9 लिच्चावी राजा जिसमे मनुदेव भी थे उन्हें अपने साथ ले लिया,9 मल्ल राजाओ को और काशी -कोशल के नरेश विरुधक को अपने साथ ले लिया,चुकी विरुधक और अजातशत्रु में काशी को लेकर विवाद था इसीलिए विरुधक ने राजा चेतक का साथ दिया ।
सेना का ढाचा आम था ,आगे पैदल सेना ,पीछे घुड़सवार ,उनके पीछे रथ और सबसे पीछे हाथी ।
राजा चेतक धनुर विद्या में उस्ताद था ,उसके बाणों से बचना नामुमकिन था और इसी कारण राजा चेतक को को अजय कहा जाता था पर राजा चेतक जैन बन गए थे और उन्होंने वर्धमान महावीर को वचन दिया था की वे एक दिन में एक ही बाण चलाएंगे ।
युद्ध शुरू हुआ और अजातशत्रु के गुलेल(Catapult) ने आतंक मचा दिया वैशाली संघ के सेनिको में ,पर राजा चेतक ने 10 कालकुमारो में से एक को अपने बाण से मार डाला ।
इसिकादर अगले 9 दिन में एक एक कर कालकुमार मरते गए और मगध कमजोर पड़ गया ।
3 दिन अजातशत्रु ने इंद्र की आराधना की और फिर रथ मुसल नाम का रथ युद्धभूमि पर उतरा ।
उसके पहियों पर तलवार लगी थी और लटकने वाली गदा जो एक बार में कई सेनिको को मार डालती ।
अब बाज़ी अजातशत्रु के हाथ में आ गई थी और राजा चेतक बुरी तरह हार गए।
राजा चेतक अपने बचे सेनिको के साथ वैशाली नगर पहोचे और उसके द्वार बंद कर दिए ,अजातशत्रु ने वैशाली पर आक्रमण किया पर उसकी मजबूत दिवार अभेद्य थी इसीलिए वह पीछे हट गया ।
वस्सकर को एक युक्ति सूजी और उसने कुलावक नाम के जैन भिक्षु के पास एक स्त्री भेजी जिसका नाम मगधिका था ।
कुलावक मगधिका के प्रेम में पड गया और मगधिका ने कुलावक को अजातशत्रु के लिए काम करने के लिए राजी किया ।
वस्सकर ने कुलावक को वैशाली में जाने को कहा और यह अफवाह फ़ैलाने को कहा की वैशाली के लोग जिस चैत्य को पूज्य मानते है वही वैशाली के दुर्गति का कारण है।
कुलावक अपने काम में सफल हुआ और इसीलिए कुछ लोगो ने उस चैत्य को उखाड़ फेका ,पर कई इस बात के विरोध में थे इसी कारण वैशाली के लोगो में आपस में ही झगडा हो गया ।
इस अवसर का लाभ उठा अजातशत्रु ने वैशाली पर हमला किया और विजय प्राप्त की ।

जय माँ भारती

Thursday, February 6, 2014

हिंदू सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य (Hindu Emperor Chandragupta Maurya)

चंद्रगुप्त मौर्य का जन्म 340 ईसापूर्व को पाटलिपुत्र में हुआ था ,वह पहला मौर्य सम्राट था और अखंड भारत पर भी राज करने वाला  करने वाला पहला सम्राट था ।
जन्म से ही वह गरीब था ,उसके पिता की मृत्यु उसके जन्म से पहले ही हो गई थी,कुछ लेखो के अनुसार वह अंतिम नंद सम्राट धनानंद का पुत्र था और उसकी माँ का नाम मुरा था ।
हर ग्रंथ में मतभेद है चंद्रगुप्त की उत्पत्ति को लेकर ।
बोद्ध ग्रंथ अनुसार चंद्रगुप्त मौर्य मोरिया नाम के काबिले से ताल्लुक रखता था जो शाक्यो के रिश्तेदार थे ।
मुरा या तो काबिले के सरदार की लड़की थी या धनानंद की दासी थी ।
10 वर्ष की उम्र में उसकी माँ मुरा की मृत्यु हो गई थी और तब चाणक्य नाम के ब्राह्मण ने अनाथ चंद्रगुप्त को पाला ।
चाणक्य को धनानंद से बदला लेना था और नंद के भ्रष्ट राज को ख़त्म करना था ।
चाणक्य ने चंद्रगुप्त सम्राट जैसी बात देखि और इसीलिए वे उसे तक्षिला ले गए ।
तक्षिला में ज्ञान प्राप्ति के बाद चाणक्य और चंद्रगुप्त ने पहले तो तक्षिला पर विजय पाई और आस पास के कई कबीलों और छोटे राज्यों को एक कर पाटलिपुत्र पर हमला किया ।
सिक्किम के कुछ काबिले मानते है की उनके पुरखे चंद्रगुप्त मौर्य की सेना में थे ।
320 ईसापूर्व में चंद्रगुप्त मौर्य मगध का सम्राट बन चूका था ।
इसके बाद उसने कई युद्ध लड़े और सम्पूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप पर एकछत्र राज किया ।
298 ईसापूर्व में चंद्रगुप्त मौर्य की मृत्यु हो गई ।
हिंदू और बोद्ध ग्रंथ चंद्रगुप्त मौर्य के अंतिम दिनों के बारे में कुछ नहीं लिखते पर कुछ जैन लेखो के अनुसार चंद्रगुप्त मौर्य जैन भिक्षु बन गया था और कई दिनों तक उपवास रखने के कारण उसकी मृत्यु हो गई ।
पर केवल जैन ग्रंथ के आधार पर कैसे कहे की चंद्रगुप्त मौर्य ने जैन धर्म अपना लिया था ??
जैन ग्रंथो में राम को जैन कहा गया है,सम्राट भारत को भी ,सम्राट अजातशत्रु को भी और प्राचीन काल में कुछ जैन तो गौतम बुध को भी जैन मानते थे पर यह सब जैन नहीं थे ।
हो सकता हो की जैन ग्रंथो की बात सही हो या गलत भी हो सकती है ।
जैन कथाओ के अनुसार चंद्रगुप्त मौर्य ने 16 सपने देखे थे और उन सपनो का अर्थ जानने चंद्रगुप्त दिगंबर पंथ के जैन गुरु भद्रबाहु के पास गए ।
भद्रबाहु ने चंद्रगुप्त को उन सपनो का अर्थ बताया फिर चंद्रगुप्त मौर्य जैन बन गया ।
इसके बाद अपने पुत्र बिंदुसार को राजा बना कर चंद्रगुप्त मौर्य भद्रबाहु के साथ चले गए ।
पर जैन कवी हेमचन्द्र के अनुसार भद्रबाहु की मृत्यु चंद्रगुप्त मौर्य के राज के 12वे वर्ष में ही हो गई थी ,तो चंद्रगुप्त किसके साथ गए थे ??
बचपन से ही चंद्रगुप्त चाणक्य के साथ रहा था और हिंदू धर्म का उसपर काफी असर था ।
चाणक्य के अर्थशास्त्र में विष्णु की आराधना करने की बात कही गई है ।
चंद्रगुप्त के काल के सिक्को पर हमें जैन प्रभाव कही नज़र नहीं आता जबकि हमें उसके सिक्को पर राम,लक्ष्मन और सीता के चित्र मिलते है ।
चित्र नंबर 1,2 और 3 देखे
इनमे आपको 3 मानवों की आकृति दिखेगी जो राम,लक्ष्मन और सीता के है ।(नंबर 1 चित्र का नाम है GH 591)
अब सम्राट अशोक ने बोद्ध धर्म अपनाया था और उसके सिक्को पर आप बोद्ध प्रभाव देख सकते है ।
चित्र नंबर 4 देखे ,आपको बोद्ध धर्म चक्र नज़र आयेगा ।
यदि चंद्रगुप्त जैन था तो उसके सिक्को में जैन चिन्ह क्यों नहीं है ??

केवल एक मत के आधार पर चंद्रगुप्त मौर्य को जैन कहना ठीक नहीं  ।

जय माँ भारती

Saturday, January 25, 2014

भारत में मधु (Honey in India)

मधु या शहद मानव शारीर के लिए काफी लाभदायक है ,आयुर्वेद में मधु काफी महत्वपूर्ण है चिकित्सा की दृष्टी से ।
सिंधु सरस्वती सभ्यता में हमें थोड़े बहोत प्रमाण मिलते है मधु के ।
ऋग्वेद में भी मधु का उल्लेख है

मधु वाता रतायते मधु कषरन्ति सिन्धवः |
माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः ||
मधु नक्तमुतोषसो मधुमत पार्थिवं रजः |
मधु दयौरस्तु नः पिता ||
मधुमान नो वनस्पतिर्मधुमानस्तु सूर्यः |
माध्वीर्गावो भवन्तु नः ||
(ऋग्वेद 1.90.6-8)

अर्थ :
हर बहती हवा को मधु बहाने दो
हर नदी और समुद्र को मधु बनाने दो
हमारी दवाए मधु बन जाये
सुबह और संध्या को मधु से भरदो
हर नकारात्मक उर्जा को मधु में बदल दो
हमारे पालनहार ,इस आकाश को मधु से भरदो
वृक्षों को मधु में बदल दो
सूर्य को मधु में बदल दो
ऐसा करदो की हमारी गाये मधु दे ।

इसके अलावा उपनिषदों में भी मधु का उल्लेख है ,मधु यज्ञो में भी उपयोग होता है ।
मधु के कई चिकित्सीय गुण है ।
आयुर्वेद में 8 तरह के मधुओ का उल्लेख है
1) माक्षिकं :इस तरह का मधु आँखों के रोग ,
हेपेटाइटिस ,पाइल्स,दमे के रोग में,खासी और टूबरकलोसिस में उपयोग होता है ।

2) भ्रामाराम : खून की उलटी के समय उपयोग किया जाता है ।
3) क्षौद्रम : मधु रोग (Diabetes ) के इलाज में उपयोग होता है ।
4) पौथिकम : मधु रोग और लिंग संक्रमण में उपयोग आता है ।
5) चथ्रम : यह परजीवी द्वारा संक्रमण,मधु रोग और खून की उलटी के इलाज म3 उपयोग होता है ।
6) आर्ध्यम : आँखों के इलाज के लिए ,खासी और अनेमिया के उपचार में उपयोग होता है ।
7) ओउद्दलकम :स्वाद बढाने और स्वरासुधि में उपयोगी,विष और लेप्रोसी के उपचार में भी उपयोगी ।
8) दालम : पाचन शक्ति बढाने ,उलटी और खासी के उपचार में उपयोग होता है ।

मधु सदियों से भारतीय मिठाईयो में भी उपयोग होता आया है ।
आज कई कंपनिया लोगो को मुर्ख बनाकर चीनी का पानी बेचते है खासकर विदेशी कंपनिया ।

जय माँ भारती

Thursday, January 23, 2014

वैदिक रूस (Vedic Russia )

एक वक़्त का जब पूरी दुनिया हिंदू धर्म था और इसका एक प्रमाण भी मिला ।
रूस में  Staraya Maina  गाव में विष्णु की मूर्ति मिली है जो 7-10 इसवी पुराणी है ।
रुसी भाषा में Staraya Maina का अर्थ है गावो की माँ या सबसे पुराना गाव ।
Staraya Maina आज की आबादी से 10 गुना ज्यादा आबादी थी प्राचीन काल ।
रूस में वाइकिंग या स्लाव लोगो के आने से पूर्व शायद वहा भारतीय होंगे या उनपर भारतीयों ने राज किया होगा ।
महाभारत में अर्जुन के उत्तर कुरु तक जाने का उल्लेख है ,महाभारत में उत्तर कुरु का जो उल्लेख है वो रूस से मिलता जुलता है ।
इसके बाद सम्राट ललितादित्य मुक्तापिद और उनके पोते जयदीप के उत्तर कुरु को जीतने का उल्लेख है ।
वह विष्णु की मूर्ति शायद वही मूर्ति है जिसे ललितादित्य ने स्त्री राज्य में बनवाया था ,चुकी स्त्री राज्य को उत्तर कुरु के दक्षिण में कहा गया है तो शायद Staraya Maina पहले स्त्री राज्य में हो ।( स्त्री राज्य पर मेरा पोस्ट जल्द आ रहा है )
रूस में ईसायत और इस्लाम जैसे पश्चिमी धर्म आने से पहले वहा नॉर्स धर्म जो वाइकिंग लोगो का था और स्लाविक धर्म था ।
नॉर्स और स्लाविक लोग दोनों ही आर्य परिवार की भाषा बोलते थे और दोनों का धर्म हिंदू धर्म से मिलता जुलता भी है ।
नॉर्स देवता थोर और स्लाविक देवता पेरून दोनों ही बिजली के देवता है और देवताओ में मुख्य ठीक इंद्र की तरह हिंदू धर्म में ।
आज कल रूस में स्लाविक वैदिक धर्म भी अपनाया जा रहा है जो रूस के प्राचीन धर्म और वैदिक धर्म का मिश्रण है ।
शायद रूस में पहले हिंदू धर्म रहा हो और फिर उसने अपना अलग रूप ले लिया ।
रूस में गई नगरो के नाम में "ग्राद" शब्द उपयोग होता है जिसका अर्थ दुर्ग या किला होता है उधारण के लिए स्टेलिनग्राद 
ग्राद शब्द संस्कृत शब्द गढ़ से मिलता है जिसका अर्थ भी दुर्ग या किला होता है ।
कुछ विद्वानों के अनुसार रूस या रसिया संस्कृत नाम ऋषि वर्ष से उत्पन्न हुआ हो ।

जय माँ भारती

Wednesday, January 15, 2014

सिंधु सरस्वती सभ्यता में दिपावली (Deepawali in Indus Valley Civilization )

यु तो यह पोस्ट मैं दिवाली में करने वाला था पर तब समय नहीं मिला और अब दुबारा दिवाली का इंतज़ार नहीं कर सकता ।
दिवाली को गुप्त काल से जोड़ा जाता था पर कुछ सबूत इशारा करते है की दिवाली सिंधु सरस्वती सभ्यता के लोग भी मनाते थे ।
हाल ही के वर्षो में पुरातत्वविदो को कई दीये प्राप्त हुए है जिनकी खास बात यह है की ये स्त्री की मूर्ति है जिनके हाथ कटोरे के आकार के है जिसमे तेल जाता और यह दीपक की तरह इस्तेमाल होता ।
यह खास मुर्तिया घरो के बहार लगाये जाते जिससे प्रतीत होता की ये मुर्तिया हाथों में दीप लिए हमारा स्वागत कर रही हो ।
पुरातत्वविदो को प्राप्त कई दीपक वर्ष में केवल कुछ ही दिनों के लिए जलाये जाते थे जो इशारा करता है की ये दीप दिवाली के पर्व पर जलाये गए थे ।
साथ ही पुरातत्वविदो को रंगोली के भी अवशेष मिले है जो इस बात की पुष्टि करता है की सिंधु सरस्वती सभ्यता के लोग दीपावली मनाते थे ।
दिवाली में सरस्वती माँ की भी पूजा होती है ,यह प्रथा उन लोगो की थी जो सरस्वती के किनारे रहते थे ,इसके अलावा धोलावीरा जो सरस्वती के किनारे था उसके सभा गृह या महल कहे जाने वाले भाग में एक कुवा मिला है जिसमे सीडिया नीचे कुवे के तल तक जाती है,तल में एक खिड़की है ,पुरातत्वविदो के अनुसार उस खिड़की में खास मोके पर दीपक जलाया जाता था ,शायद उस कुवे में किसी प्रकार की पूजा होती हो ।
क्युकी उस कुवे में सरस्वती नदी का पानी आता हो इसीलिए धोलावीरा के लोग उस कुवे में सरस्वती नदी के पानी की पूजा सरस्वती देवी मानकर करते हो ।
दिवाली में दरवाजे के बहार स्वस्तिक बनाया जाता है और सिंधु सरस्वती सभ्यता में स्वस्तिक के काफी चिन्ह मिले है ।

(नंबर 2 तस्वीर में हड़प्पा की मुर्तिया है जीके सर पर दीप है )

जय माँ भारती

Sunday, January 12, 2014

चुंबकीय उत्तोलन और हिंदू मंदिर (Magnetic levitation and Hindu Temples)

आपने जेकी चेन की The Myth नाम की फिल्म तो देखि ही होगी ??
नहीं तो जरुर देखे ,उसमे जेकी चेन एक पुरातत्व विद था जो भारत में एक मंदिर में आता है ।
उस मंदिर में साधू उड़ पा रहे थे क्युकी 2 काले जादुई पत्थर के कारण ।
यह कल्पना नहीं पर सत्य है ,पर साधू के बजाये मुर्तिया हवा में तैरती थी ।

चुम्बक का उल्लेख हिंदू ग्रंथ में
मणिगमनं सूच्यभिसर्पण मित्यदृष्ट कारणं कम्||
वैशेषिक दर्शन ५/१/१५||
अर्थात् तृणो का मणि की ओर चलना ओर सुई
का चुम्बक की ओर चलना,अदृश्य कर्षण
शक्ति के कारण है । सोत्र
यह कणाद मुनि के ग्रंथ  वैशेषिक दर्शन है ,कणाद मुनि 600 ईसापूर्व के थे यानि गौतम बुद्ध के समय का ।
चुंबकीय उत्तोलन या Magnetic Levitation का अर्थ होता है चुंबकीय बल के सहारे तैरना ।
हर चुंबक के 2 ध्रुव होते है उत्तर और दक्षिण
चुंबक का नियम होता है की विपरीत ध्रुव एक दुसरे को आकर्षित करते है और समान ध्रुव एक दुसरे को धकेलते है ।
उधारण :
उत्तर ध्रुव दक्षिण ध्रुव को या दक्षिण ध्रुव उत्तर ध्रुव को आकर्षित करता है
पर
उत्तर ध्रुव उत्तर ध्रुव को या दक्षिण ध्रुव दक्षिण ध्रुव को धकेलता है ।
यही नियम बुलेट ट्रेन में काम आता है ।
2 समान ध्रुव एक दुसरे को धकेलते है जिससे इतना बल पैदा होता है की ट्रेन आगे बड़े ।
इसी का उपयोग हिंदुओ ने अपने मंदिरों में किया ।
मुझे 4 हिंदू मंदिरो का विवरण मिला है जिसमे चुंबकीय उत्तोलन का उपयोग हुआ था ।

सोमनाथ मंदिर (600 इसवी )
गुजरात में स्थित सोमनाथ मंदिर को गुजरात के यादव राजाओ ने बनाया था 600 इसवी में ।
सोमनाथ ज्योतिर्लिंगो में से एक है ।
कई मुस्लमान राजाओ ने इसको तोडा और इसमें स्थित शिव लिंग भी तोड़ दिया ।
स्थानीय लेखो के अनुसार सोमनाथ मंदिर का शिव लिंग हवा में तैरता था ।
हिंदुओ के अलावा मुसलमानों ने भी इसका वर्णन किया ।
क्वाज़िनी अल ज़कारिया सन 1300 इसवी में भारत में आया था ,वे फारसी लेखक थे और दुनिया के अजीब अजीब वस्तुओ पर लिखते थे ।
सोमनाथ के शिवलिंग पर क्वाज़िनी लिखते है :- "सोमनाथ मंदिर के बिच में सोमनाथ की मूर्ति थी ,वह हवा में तैर रही थी ,उसे न ऊपर से सहारा था  न नीचे से ।स्थानीय ही क्या मुस्लमान भी आश्चर्य करेगा ।"
इस विवरण से पुष्टि हो गई है की सोमनाथ मंदिर में शिव लिंग हवा में तैरता था ।
कुछ विद्वानों अनुसार यह आँखों का धोका था ।

सम्राट ललितादित्य मुक्तापिद का विष्णु मंदिर (700 इसवी )
सम्राट ललितादित्य कश्मीर के महान राजा थे जिन्होंने अरब और तिब्बत के हमले को रोक और कन्नौज पर राज किया जो उस समय भारत का केंद्र माना जाता था ।
स्त्री राज्य जो असम में ही कही स्थित था उसे जीतने के बाद सम्राट ललितादित्य ने स्त्री राज्य में ही विष्णु मंदिर की स्थापना की थी ।
विवरणों के अनुसार उस मंदिर में स्थित विष्णु जी की मूर्ति हवा में तैरती थी ।
इस मंदिर की सही स्थिति नहीं पता और इसके अवशेष अभी तक नहीं मिले ।
विद्वानों के अनुसार जिस कदर मुसलमानों ने ललितादित्य का सूर्य मंदिर तोड़ दिया था ठीक वैसे ही इस मंदिर को भी तोड़ा गया था ।

वज्रवराही का मंदिर (800 इसवी )
यह मंदिर है तो बोद्ध पर हिंदू देवी वराही को समर्पित है ।
यह मंदिर भूटान में Chumphu nye में स्थित है ,इस मंदिर के भीतर फोटो लेने की मनाही है इसीलिए वराही देवी की हवा में तैरते हुए फोटो नहीं ।
कई प्रत्यक्षदर्शी मंदिर में जा चुके है और उनके अनुसार वराही देवी की मूर्ति और थल के बिच 1 ऊँगली भर जगह है और मूर्ति बिना सपोर्ट के हवा में है ।
स्थानीय लोगो के अनुसार वह मूर्ति मनुष्य निर्मित नहीं बल्कि प्रकट हुई है ।
कुछ विद्वानों के अनुसार वह मूर्ति चुंबक के कारण हवा में तैर पा रही है ।
क्युकी भूटान और तिब्बत का बोद्ध धर्म बुद्ध के उपदेशो पे कम और हिंदू उपदेशो पर ज्यादा है इसीलिए मंदिर बनाने का यह ज्ञान हिंदुओ से बोद्ध भिक्षुओ को मिला ।
यही एक बची हुई ऐसी मूर्ति है जो सिद्ध करती है की हिंदू मंदिरों में मुर्तिया हवा में तैरती थी ।

कोणार्क का सूर्य मंदिर (1300 इसवी )
इसा के 1300 वर्ष बाद उड़ीसा में पूर्वी गंग राजाओ ने कोणार्क का सूर्य मंदिर बनवाया था ।
स्थानीय कथाओ के अनुसार कोणार्क के सूर्य मंदिर में सूर्य देव की जो मूर्ति थी वह हवा में तैरती थी ।
पुरातात्विक विश्लेषण से पता चला है की मंदिर का मुख्य भाग चुंबक से बना था जो गिर गया था ।
कम से कम 52 टन चुंबक मिलने की बात कही जाती है ।
उसी चुंबक वाले भाग में वह मूर्ति थी ,यह सबसे अच्छा साबुत है हिंदू मंदिरों में चुंबकीय उत्तोलन का क्युकी इस मंदिर में चुंबक मिला है ।
मूर्ति को हवा में उठाने के साथ चुंबक का एक और उपयोग था यानि चुंबकीय चिकित्सा ।
चुंबकीय चिकित्सा का अर्थ है चुंबक की उर्जा से इलाज करना ।
कोणार्क के सूर्य मंदिर का बहोत सा ढाचा गिर गया था जिसमे वह चुंबक से बना भाग भी था ।

भारत में चुंबक का उल्लेख 600 ईसापूर्व से मिलता है ,मुसलमानों के साथ साथ पुरातात्विक सबूत भी हिंदू मंदिरों में चुंबकीय उत्तोलन के सबूत देते है ।

(नीचे फोटो में गणेश जी की मूर्ति हवा में तैर पा रही है चुंबकीय बल के कारण )

जय माँ भारती