Tuesday, May 8, 2018

राजा पोरस एक झूठा और काल्पनिक पात्र यूनानियों द्वारा बनाया हुआ।(King Porus is Fake and made up Character by Greeks)

क्षमा चाहता हूँ कि कई दिनों तक पोस्ट नही कर पाया।
कुछ महीने पूर्व ही सोनी टीवी पर एक धारावाहिक शुरू हुआ था जिसका नाम पोरस है और यह काफी प्रचलित भी हो रहा है। मेने इसके कुछ एपिसोड देखे और मुझे इसने काफी निराश किया। उसमे एक तो भर भर के झूठ था और ऊपर से हमारी भोली भाली जनता उन सब को सत्य मां रही थी। इसी कारण जब मैने इस बारे में शोद्ध किया तो मैं इस नतीजे पर आया कि राजा पोरस एक काल्पनिक और झूठा किरदार है जिसे यूनानियों ने अपने प्रोपगंडा के लिए बनाया था।
आज इस झूठ का आलम यह है कि लोग एक क्रूर और हत्यारे राजा को महान बोलते है और उसके बनाए एक काल्पनिक किरदार को गर्व से अपना पुरखा मानते है।
मैने देखा है असलियत में और इंटरनेट पर की कैसे लोग पोरस को भारत का पहला रक्षक, पंजाब का शेर, सच्चा राजपूत, चंद्रवंश का गौरव, सूर्यवंश का दीपक आदि कहते है। कुछ पाकिस्तानी भाई तो उसे मुसलमान भी बताते है  और कुछ उसे इसराइल के भटके क़बीलों में से एक काबिले का वंशज भी।
आज सिकंदर की आत्मा जहाँ भी होगी, वह यह देख खुश हो रही होगी कि भले ही जीते जी वह भारत जीत न सका, पर मारने के बाद कमसे कम वह अपने झूठ से भारतीयों के दिमाग को कब्ज़ा पाया।
चलिए कुछ बातों पर ध्यान देते है।

पहला: (उसके बारे में जो भी जानकारी उप्लब्ध है, वह यूनानी लेखों से ही मिलती है।)

पोरस के बारे में जो हमारे जानकारी मिलती है वह केवल और केवल यूनानी लेखको से प्राप्त होती है। क्यों भला भारतीयों ने ऐसे वीर और पराक्रमी राजा के बारे में  नही लिखा जिसने तथाकथित सिकंदर के आक्रमण से भारत की रक्षा की थी। उसके बारे में तो छोड़िये, उस लड़ाई का या खुद सिकंदर के भारत के आक्रमण का हमे कही ज़िक्र नही मिलता भारत मे, भले ही वह हिन्दू ग्रंथ हो या बौद्ध या फिर जैन।
भला हम केवल यूनानियों की बातें ही क्यों माने? क्या वे सच्चाई के ठेकेदार थे और केवल सत्य ही लिखते थे? यहाँ हम यह कह सकते है कि उनकी बांतों में लगभग 50% सत्यता हो सकती है। यहाँ मै 50% भी इसलिए दे रहा हूँ क्योंकि मैं कोई विशेषज्ञ नही हु इस विषय का और कोई भी विशेषज्ञ आकर बोल सकता है कि मैं झूठा हूँ, भले ही मेरे पास हज़ारो प्रमाण ही क्यों न हो अपनी बात सिद्ध करने के लिए। यह 50% उन लोगो के लिए है जो अंधो की तरह इन विशेषज्ञ लोगो की बांतों पर विश्वास कर लेते है। पहले खुद पढ़े और फिर विश्वास करे। मैने अपना यह सिद्धांत अपने एक पढ़े लिखे दोस्त को बताया था और उसने मुझसे पूछा कि क्या मैं भांग कहकर आया हूँ? वह यही कह रहा था कि विशेषज्ञ गलत नही हो सकते।
खैर छोड़िए और आगे बढ़ते है।

दूसरा
(उसका असली नाम क्या था?)

हम बस उसे पोरस नाम से जानते है और कुछ विशेषज्ञों का अंदाज़ा था कि पोरस एक यूनानी नाम है जो शायद संस्कृत पुरु से आया हो। कुछ कहते है कि उसका नाम पुरषोत्तम था, जिसका वह लोग कोई प्रमाण नही दे पाते। और कुछ उसे मुद्राराक्षस नाम के एक किरदार पर्वतेश्वर से भी जोड़ देते है। पर्वतेश्वर भी गंधार राज्य के पड़ोस में राज करता था जैसा कि पोरस का भी था, पर नाटक में पर्वतेश्वर और गंधार नरेश में मित्रता थी जबकि यूनानियों के अनुसार गंधार नरेश और पोरस एक दूसरे के दुश्मन थे। साथ ही मुद्राराक्षस में सिकंदर के आक्रमण और पर्वतेश्वर के उससे लड़ने का कोई उल्लेख नही है। पर्वतेश्वर का एक भाई भी था जिसका नाम मलयकेतु था और उसी ने पर्वतेश्वर की हत्या की थी, जबकि यूनानियों अनुसार, किसी यूनानी अफसर ने पोरस की हत्या की थी।
नाम तो छोड़िए, हमे उसके कुल और माता पिता तक का नाम नही पता। इतिहासकारो ने बस अंदाज़ा लगा लिया कि क्योंकि उसका नाम पुरु था, इसलिए वह पुरु वंश का होगा और शायद उसके राज्य का नाम पुरु ही होगा।
महाभारत में पुरु राज्य ही आगे चलकर कुरु राज्य बन जाता है और वे आज के दिल्ली और मेरठ के इलाके पर
राज करते थे न की पंजाब में। 

तीसरा 
(हमें गंधार के करीब के महाजनपदो में पुरु राज्य का नाम नहीं मिलता)

बौद्ध, जैन और हिन्दू ग्रंथो में हमें कही भी गंधार महाजनपद के करीब किसी पुरु महाजनपद का उल्लेख नहीं मिल्त। गंधार के करीब जो महाजनपद बताया गया है वह है कम्बोज।


चौथा
(ईरानी लेखो अनुसार पंजाब पर कुछ वर्षो तक उनका राज था पर यूनानी किसी भी ईरानी अफसर या व्यवस्था का जीकर नहीं करते)

ईरानी शासको के अनुसार उन्होंने गंधार और हिन्द जीता था पर अब तक हमारे पास कोई भी पुरातात्विक साबुत नहीं है। शायद भारतीय राजाओ को हराकर उन्होंने उन्हें वहा राज करते रहने की अनुमति दे दी हो और बदले में वः लोग ईरान को कर चुकाएँगे। पर यूनानी लेखको ने भारत में किसी भी ईरानी अफसर या राजा का ज़िक्र नहीं किया, जिसका अर्थ हो सकता है, या तो वह लोग यहाँ ईरानी शासन मिटने के कई वर्ष बाद आये या फिर कभी आये ही नहीं। दोनों ही स्थिति में सिद्ध होता है की उन्होंने झूठ लिखा था। 

पाँचवा 
(यूनानी तक्षिला विश्वविद्यालय का उल्लेख नहीं किये है)

यूनानियो ने कही भी तक्षिला विश्वविद्यालय का ज़िक्र नहीं किया जो की बहुत ताज्जुब की बात है क्युकी गंधार गंधार उनका मित्र राष्ट्र था। इसके अलवा उन्होंने आचार्य चाणक्य का उल्लेख भी नहीं किया जो तक्षिला के ही थे और चन्द्रगुप्त मौर्य के गुरु थे। जबकि यूनानी चन्द्रगुप्त का और सिकंदर के मिलने का उल्लेख करते है।

छतवा

(सिकंदर की आदत थी की वह जिस देश में भी जाता,वहा की थोड़ी बहुत संस्कृति अपना लेता पर उसने भारतीय संस्कृति नहीं अपनाई) 

सिकंदर भारत में २ वर्ष तक रहा पर उसने भारत की कोई भी संस्कृति नहीं अपनाई। वह जहा भी जाता वहा की संस्कृति अपनाता जैसे की वह जब मिस्र गया तो उसने वहा की थोड़ी बहुत संस्कृति अपना ली और मिस्र के राजा फ़राओ की उपाधि धरना की, और जब वह ईरान गया तो उसने ईरान के राजा शहनशा की उपाधि धारण की और वेश भूषा अपनाई। पर भारत में उसने ऐसा कुछ नहीं किया और न ही यूनानी लेखक हिन्दू, जैन या बौद्ध धर्म का कोई उल्लेख करते है, यहाँ तक की सिकंदर ने महाराज की उपाधि भी नहीं ली। हा बस एक बेढंगी सी कहानी बना दी की सिकंदर भारत से एक नंगे सन्यासी को लेकर चला गया था।

सातवा
(वह इतना दयावान नहीं था की किसी से खुश होकर उसे उसका राज्य लौटा दे )

सिकंदर बेहद ही क्रूर था, उसने अपने उन सभी सम्भंधियो को मरवा दिया था जो उसकी गद्दी को छीन सकते थे और इनमे कई छोटे छोटे बच्चे भी थे। वह जो शहर जीतता उसे जला देता और वहा के लोगो को बेहरमी से मरवा देता। ईरान के राजा दारा तृतीय ने सिकंदर को २ दफा संधि का प्रस्ताव भेजा था और दोनों ही दफा सिकंदर ने उसे ठुकरा दिया। ईरान के आगे अस्वक जाति एक दुर्ग से उसका सामना हुआ, वहा के लगभग सभी वीर लड़ते लड़ते वीर गति को प्राप्त हो गए, यहाँ तक की उनका राजा भी। इस सब के बावजूद राजा की बड़ी माँ ने दुर्ग को संभाले रखा, और जब सिकंदर को लगा की दुर्ग जितना मुस्किल है तो उसने बड़ी रानी माँ की संधि स्वीकारने का झूठा नाटक किया और जैसे ही सिकंदर का अस्वासन मिलते ही अस्वको ने द्वार खोले, सिकंदर ने अपनी सेना को सबको मार डालने का आदेश दिया। और मरने वाले में अधिकतर औरतें और बच्चे थे।

सब सिकंदर इतना क्रूर था, तो यह कहानी हम कैसे मान ले की उसने पोरस से खुश हो उसे उसका राज्य लौटा दिया था?

इससे यही सिद्ध होता है की सिकंदर भारत आया ही नहीं था। वह शायद आज के अफ़ग़ानिस्तान तक पंहुचा होगा और शायद आगे बाद ही न पाया होगा। लगातार हारने के बाद जब उसकी सेना ने सुना की भारत में ननदों की काफी बड़ी सेना है तो उन्होंने विद्रोह कर लिया और वे वाही से बाबल चले गए। बाबल पहोच सिकंदर ने कहानी रच दी की वह भारत से जीतकर लौटा है और अपने मन में हार का गम लिए युही एक दिन वह मर गया।

जय माँ भारती। 

Monday, October 10, 2016

सोम उर्जा है न की शराब।

पश्चिमी इतिहासकारों ने जब आर्यों का इतिहास लिखना शुरू किया तब उन्होंने ईरानी ग्रंथो और वेदों में समानता देखि। इसका कारण यह था की ईरानी लोग आर्य ही थे जिन्होंने अपना धर्म त्याग दिया था पर उसके बावजूद उनके नए धर्म में आर्य धर्म के कई अंश बचे हुए थे और उनमे सोम भी है। ईरानी ग्रंथो में सोम को होम कहा गया है जो की किसी वनस्पति का रस था जिसे ईरानी अपने अनुष्ठानो में उपयोग करते थे। ईरानी ग्रंथो यस्न में ही लिखा है कि होम एक वनस्पति है [यस्न १०.५] और यह शराब की तरह मादक है [यस्न १०.८] साथ है होम रस को सबसे पहले यिम के पिता विवान्ह्वंत ने बनाया था [९.४]।

पश्चिमी इतिहासकारों ने इन्ही सब को पढ़ कर कल्पना कर ली कि होम या सोम असल में किसी वनस्पति का रस है जो मादक है। पश्चिम के श्री श्री डेविड अन्थोनी ने अपनी पुस्तक में इसी कल्पना के आधार पर लिखा है कि आर्य यूरेशिया से आकार वक्शु नदी के पास बसे और वक्शु सभ्यता का निर्माण किया। यहाँ आर्य और अनार्य मध्य एशियाई लोगो का मिश्रण हुआ जिस कारण आर्यों ने उन मध्य एशियाई लोगो के कई रीत अपना ली जिनमे सोम रस का सेवन भी शामिल था। अपनी बातों को सिद्ध करने के लिए श्री श्री डेविड जी बताते है कि वक्शु सभ्यता के नगरो में कई जगह ऐसे बर्तन मिले है जिसे सोम अनुष्ठानो के लिए उपयोग किया जाता होगा। श्री श्री वेंडी दोनिगेर जिन्हें पता नहीं संस्कृत में डिग्री कहा से मिल गयी लिखती है कि आर्य शराबी लोग थे और जिन ऋषियों को वेदों का ज्ञान मिला वह असल में सोम रस के नशे और भ्रम के कारण उत्पन हुआ था। [The Hindus: An Alternative History]  

फिर भी यह महाज्ञानी लोग सोम की पहचान करने में असफल रहे। जब इन्हें अपने शोधो से यह पता चल गया कि सोम अनुष्ठानो की उत्पत्ति कहा हुई और किस कदर आर्य ऋषियों को वेद का ज्ञान प्राप्त हुआ तो आप उस वनस्पति की पहचान क्यों न कर सके? आज टेक्नोलॉजी इतनी आगे है प्राचीन काल के बर्तन की खुरचन से या मानव के मॉल से पता चल जाता है की वे क्या खाते थे। तो फिर वक्शु सभ्यता के उन तथाकथित बर्तनों को जिनमे सोम रस रखा जाता था उसका विश्लेषण कर पता क्यों नहीं करते की सोम किस वनस्पति से आया है?

यह इसलिए संभव नहीं है क्युकी पश्चिमी इतिहासकार भी जानते है की उनकी बातें केवल कल्पना मात्र है। सोम असल में वह दिव्य उर्जा है जो सभी जीवो में है। यह उर्जा वृक्ष आदि सूर्य और चन्द्र से प्राप्त करते है और यही उर्जा हमें भोजन में प्राप्त होती है। पुरानो के अनुसार सोम देव या चन्द्र चन्द्र ग्रह और जंगल और जानवरों के पालनहार है। वे ही है जो सूर्य की उर्जा को शीतल कर इस संसार को देते है और हमारा पालन पोषण करते है। ऋग्वेद के ४ मंडल ४० सूक्त के मंत्र २ अनुसार सोम और पूषण अर्थात चन्द्र और सूर्य के कारण इस संसार में अन्धकार गायब हो गया और इन्ही दोनों के कारण फासले अच्छी और गाय पौष्टिक दूध देती है वेदों के अंग्रेजी अनुवाद अनुसार, वही स्वामी दयानंद सरस्वतीजी के अनुसार यहाँ सोम का अर्थ चन्द्र और औषिधि है। 

Sunday, August 21, 2016

मोहनजोदड़ो पर उठाये गए सवालो का उत्तर


ऋतिक रोशन के फ़िल्म आई थी अभी मोहनजोदड़ो नाम की जो सिंधु सभ्यता के नगर मोहनजोदड़ो पर आधारित है। फ़िल्म आई नहीं की स्वघोषित इतिहासकार और अन्य सभी लोग फ़िल्म की आलोचना करने लगे, कहने लगे की फ़िल्म में गलत इतिहास दिखाया गया है। मैं ऋतिक रोशन का प्रशंसक नहीं हु पर जो आरोप इस फ़िल्म पर लगे है उनके विरुद्ध हु। भाई फ़िल्म है यह कोई इतिहास संबंधी डॉक्यूमेंट्री नहीं। फ़िल्म है तो उसमे कुछ भी बताये क्या फरक पड़ता है। अब हॉलीवुड की फ़िल्म 300 ही ले लीजिये, उसमे कई खामिया है पर फिर भी सबने मज़े से देखि, किसी को यवन या ईरान के इतिहास का कुछ पता नहीं और फिर भी देख ली। फ़िल्म में ईरानियो को राक्षसो सा दिखाया,  जो की गलत है पर हमें क्या। लेकिन मोहनजोदड़ो आई तो बन गए इतिहासकार।

अब कुछ आरोपो का मैं खंडन करता हूँ।

1) मोहनजोदड़ो के लोग अहिंसावादी थे पर फ़िल्म में हिंसा के कई दृश्य बताये गए थे।

ऊ: मोहनजोदड़ो या सिंधु सभ्यता के लोग अहिंसावादी नहीं थे। सिंधु सभ्यता के लोगो को अहिंसावादी समझ जाता है क्योंकि सिंधु सभ्यता में आज तक एक में प्रमाण नहीं मिले है युद्ध के या कोई चित्र मिला है युद्ध पर आधारित। पर हमें कुछ प्रमाण मिले है जैसे कि कुछ कंकालो पर निशान मिले है जो हिंसा के प्रमाण थे और उनकी मृत्यु किसी झड़प में हुई थी। साथ ही हमें कई हथियार भी मिले है। कुछ लोगो के अनुसार वे हथियार केवल जानवरो से सुरक्षा के लिए था पर अहिंसावादी व्यक्ति जानवरो पर भी हथियार इस्तेमाल नहीं करेगा। कुछ के अनुसार सिंधु के नगरो में सुरक्षा दीवारे है जो युद्ध से बचाती है। पर यह जरुरी नहीं की सुरक्षा दीवार न होना सिंधु सभ्यता के लोगो को शांतिप्रिय सिद्ध करे। 300 के मुख्य पात्र स्पार्टा नाम के नगर राज्य से थे। स्पार्टा के लोग लड़ाकू और जंगी किस्म के थे पर उनके नगर स्पार्टा में एक भी सुरक्षा दीवार नहीं थी।

2) फ़िल्म में लोगो को हिंदी बोलते हुए बताया गया है वो भी शुद्ध हिंदी जिसमे कई संस्कृत शब्द है और मोहनजोदड़ो के लोग आर्य भाषा नहीं बोलते थे।

ऊ: भाई जब फ़िल्म हिंदी बोलने वाले लोगो के लिए है तो किरदार हिंदी में ही बोलेंगे न और चुकी फ़िल्म प्राचीन काल पर आधारित है तो शुद्ध हिंदी का प्रयोग होगा ही। अब मोहनजोदड़ो के लोग कोनसी भाषा बोलते थे इस बारे में पता नहीं इसीलिए केवल हिंदी का प्रयोग हुआ है। यदि हमें मोहनजोदड़ो की प्राचीन भाषा क्व बारे पता चल भी जाये तो पूरी फ़िल्म उस भाषा में तो बना नहीं सकते क्योंकि आम जनता को वह समझ आएगी नहीं। और हमें यह भी नहीं पता की मोहनजोदड़ो के लोगो की भाषा ईरानी एलामि भाषा से संभंधित थी या आर्य भाषाओ से, तो यह कहना की मोहनजोदड़ो के लोग गैर-आर्य भाषा बोलते थे गलत है।

3) मोहनजोदड़ो फ़िल्म में नायिका और अन्य किरदारों को जो वस्त्र दिए है वैसे वस्त्र मोहनजोदड़ो के लोग पहनते ही नहीं थे।

ऊ: इस बारे में सेंट ज़ेवियर कॉलेज की एक इतिहास की प्रोफेसर ने कहा था कि सिंधु सभ्यता की लोग फ़िल्म में दिखाए गए जैसी वस्त्र पहनते ही नहीं थे अपितु मोहनजोदड़ो से प्राप्त मूर्तियो में महिलाएं नग्न दिखाई गयी है केवल आभूषणों से उनके कुछ अंग ढके हुए है। तो हम यह मान ले की सिंधु सभ्यता में लोग नग्न ही घूमते थे? भाई में पंजाब गया हु, रात में जो ठण्ड लगती है उसमे 2 कम्बल भी कम लगते है और यहाँ यह लोग हमें बता रहे है की सिंधु सभ्यता के लोग ठण्ड में भी नग्न घूमते थे। मूर्तियो में लोगो को नग्न बताने का अर्थ यह नहीं की मोहनजोदड़ो के लोग सच में नग्न घूमते थे। अब यवन में भी कई मुर्तिया नग्न ही है पर यवनी कपड़े पहनते थे। साथ ही सिंधु सभ्यता के लोग कपास भी उगाते थे जो वस्त्र बनाने में काम आता है तो उस कपास से वे वस्त्र बनाते ही होंगे। हैम ठीक से जानते नहीं है उस काल की वेश भूषा क्या थी इसलिए फ़िल्म में कुछ भी बता दिया, अब क्या फ़िल्म की नायिका को नग्न दिखाएंगे फ़िल्म में क्योंकि हमें वस्त्र के अधिक प्रमाण नहीं मिले?

4) मोहनजोदड़ो फ़िल्म में अश्व को दिखाया गया है जब कि अश्व उस समय भारत में थे ही नहीं।

ऊ: भारत में अश्व के एक पूर्वज के अवशेष मिले है जो 70 हज़ार वर्ष पुराने है और सिंधु सभ्यता के एक नगर लोथल में अश्व के प्रमाण मिले है करीब 2000 ईसापूर्व के आसपास के। तो यह कहना की भारत में उस समय अश्व थे ही नहीं बिलकुल गलत है। फ़िल्म के अनुसार वह फ़िल्म 2016 ईसापूर्व के मोहनजोदड़ो पर है जो कि लोथल में मिले घोड़े के प्रमाणों के आसपास ही है। लोथल मोहनजोदड़ो के काफी दक्षिण में है। यदि इतने दक्षिण में घोड़े पहोच गए तो मोहनजोदड़ो में क्यों नहीं?शायद सिंधु सभ्यता के लोगो ने अश्व पालना बादमे शुरू किया जिसका अर्थ यह नहीं की भारत में अश्व थे ही नहीं। अब विश्वप्रसिद्ध एकसिंघे या Unicorn को ही ले लीजिये जो सिंधु सभ्यता में काफी प्रसिद्ध था। हम जानते है की एकसिंघा जैसा कोई जिव नहीं है और नाही उसके प्रमाण है फिर भी सिंधु सभ्यता के लोगो ने उसे अपने कलाकृतियों में बताया। जरुरी नहीं की सिंधु सभ्यता के लोगो ने जो अपनी कलाकृतियों में दिखाया हो वह सही हो।

5) मोहनजोदड़ो फ़िल्म का खलनायक जो है वो राजा या नेता है पर इस बात का कोई प्रमाण नहीं कि वहा कोई राजा या नेता राज करता था।

उ: इस सवाल में ही उत्तर है। हमें नहीं पता कि मोहनजोदड़ो नगर की व्यवस्था कैसी थी और न ही उसके अधिक प्रमाण है। क्योंकि मैं पहले भी बता चूका हूँ कि यह केवल एक फ़िल्म है जो काल्पनिक कहानी पर आधारित है तो इसमें सही इतिहास की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। उद्धरण के लिए फ़िल्म 300, इस फ़िल्म में स्पार्टा नगर राज्य का केवल एक ही राजा, राजा लियोनाइदास ही दिखाया गया है पर सच यह है की स्पार्टा के 2 अलग अलग राजा होते थे अलग अलग राजवंश के जो साथ मिलकर राज करते थे। पर फ़िल्म में दूसरा राजा गायब है। तब क्यों किसी ने सवाल नहीं उठाये?
क्योंकि भाई फ़िल्म है
जयादा दिमाग मत लगाओ।

जय माँ भारती

Friday, May 20, 2016

आर्य आक्रमण सिधांत का अंत

अंग्रजो के भारत में आने के बाद उन्होंने अपने संस्कृत वाहियाद ज्ञान के बदोलत एक ऐसा इतिहास खड़ा किया जो 200 वर्षो से अधिक तक रहा और भारतीयों को खुदको विदेशी समझने पर मजबूर करता रहा। अंग्रेजो ने वेदों और उपनिषदों के अपने कम ज्ञान के कारण न जाने क्या क्या गप्प रचे। आर्यों को यूरोपीय साबित कर दिया, आर्यों को असभ्य और जंगली बना दिया, आर्यों को मांसाहारी बना दिया और तो और आर्यों को क्रूर और बर्बर लूटेरे बना दिया जिन्होंने भारत के मूल लोगो पर अत्याचार किये।
यूरोपीय  द्वारा आर्यों का अपमान 

पर भला असभ्य और जंगली लोग भारत के मूल लोगो को कैसे हरा सकते है जो उनसे अधिक सभ्य और व्यवस्तिथ थी। यह बात पुराणी हो चुकी है की सिन्धु घाटी के लोग शांतिप्रिय लोग थे और उनके पास हथियार, फ़ौज और घोड़े नहीं थे जिस कारण वे आर्यों से हारे। यदि आप यूरोपीय गप्प जैसे दशाराज्ञ युद्ध  और अन्य काल्पनिक युद्ध पढ़े, जो कि यूरोपियो द्वारा निर्मित और वेदों में गुशैड़ी हुई गप्प है, उसमे आर्यों के अलावा दास या अन्य गैर आर्यों राजाओ के पास सेना, हथियार और घोड़े बताए गए है। दास और अन्य गैर आर्य राजा जिन्हें पश्चिमी विद्वान अक्सर सिन्धु घाटी के लोगो से जोड़ते है उनके पास हथियार, फ़ौज और घोड़े कहा से आये? जबकि इनका खुदका यह कहना है कि सिन्धु घाटी के लोग शांतिप्रिय थे। और दशाराज्ञ युद्ध गप्प से तो लगता है आर्य और अनार्य लोगो में ज्यादा अंतर नहीं था। 

अमेरिका के विद्वान रिचर्ड एच. मीडो शांतिप्रिय सिन्धु घाटी मिथ्या पर कहते है:-

"विश्व में आज तक ऐसी कोई सभ्यता नहीं हुई जिसमे किसी प्रकार की हिंसा या झड़प न रही हो। पहले माया सभ्यता या मध्य अमेरिकी सभ्यता को भी शांतिप्रिय माना जाता था। जब उनके लेखो को पढ़ा गया और उनके जीवाश्मो की जाच हुई तो पता चला की बात कुछ और ही है और यह बिना किसी आधार के है। सिन्धु घाटी के मामले में हमारे अधिक सबूत नहीं है जैसे की उनकी भाषा का ज्ञान और चित्र। खड़ी  फौजे तो आज के युग की दें है, पहले लड़ाईया लूट के मकसद से या समय अनुसार तय किये जाते थे। प्रारंभिक युद्ध तालाब और ज़मीन के लिए आपसी लड़ाईया रही होंगी जो राजा और सरदारों द्वारा लड़े जाते थे। विश्व का पहला साम्राज्य  अक्कदी  साम्राज्य ने अपने सभी पड़ोसी राज्यों को जीता था जो अधिकतर दीवार द्वारा सुरक्षित होती थी तो दीवार होना कोई मायने नहीं रखता। यहाँ मुश्किल यह है है कि हमें सिन्धु घाटी के लोगो के बारे में अधिक ज्ञान नहीं है जितना अन्य सभ्यताओ के बारे में है। सिन्धु घाटी से हमें ताम्बे और मिश्रित धातुओ के हथियार प्राप्त हुए है और एक छवि में एक पुरुष के हाथ में भाला दिखाया गया हैजिससे वह एक सांड को मार रहा है।"
सिन्धु घाटी से प्राप्त हथियार

आर्य असभ्य तो बिलकुल नहीं थे, यदि वे होते तो वेदों का ज्ञान कैसे संझोते? वेदों में राजा और राष्ट्र का उल्लेख है जो बताता है की आर्य काफी सभ्य थे और उनके राज्य भी थे। यदि आर्य कबीलाई और जंगली होते तो फिर उनके ग्रंथो में राष्ट्र शब्द क्यों है जिसका अर्थ देश है जबकि कबीलाई लोग छोटे छोटे कबीलों में रहते है। 


आज अमेरिका सहित कई अन्य देशो में आर्य आक्रमण सिधांत को हटाकर सिन्धु घाटी के पतन का कारण प्राकृतिक विपदा कर दिया गया है इतिहास की पुस्तकों में। पर फिर भी आर्यों को विदेशी ह कहा गया है और एक नया सिधांत आर्य प्रवास सिधांत बना दिया गया  है।

Thursday, January 21, 2016

पाणिनि का समयकाल

इंटरनेट पर कई लोग मिल जाएँगे जो कई तरह की उल जलूल बातें करते है। मैं भी एक सज्जन से मिला जिनके अनुसार संस्कृत यूनानी भाषा का Lingua Franca है और पाणिनि जी ने यूनानी भाषा के प्रभाव में आकर सस्कृत व्याकरण लिखा। वे सज्जन एक स्वघोषित इतिहासकार है और उनका कहना है की वे श्वेत यूरोपीय इतिहासकारो के झूठे इतिहास की पोल खोलते है और अश्वेत लोगो का सच्चा इतिहास बताते है, क्योंकि वे सज्जन एक अफ़्रीकी अमेरिकन है इसलिए वे अश्वेत लोगो के इतिहास का गौरवपूर्ण सच बताने की कोशिश  करते है।

उनका कहना था की हिन्द-यूरोपीय भाषा परिवार का कोई अस्तित्व ही नहीं और यह केवल यूरोपीय इतिहासकारो का झूठ है ताकि वे श्वेत आर्य नस्ल की महानता बता सके। उनके अनुसार संस्कृत और यूनानी भाषा और अन्य दूसरी यूरोपिय भाषाओ में इतनी समानताए इसलिए है क्योंकि पाणिनि ने यूनानी भाषा का अध्यन कर संस्कृत में कई परिवर्तन किये और बाद में संस्कृत पुरे भारत में फैली। उनके अनुसार तो संस्कृत का 500 ईसापूर्व से पहले अस्तित्व ही नहीं था और वेद भी इस काल से पहले लिखे नहीं गए थे। उन सज्जन का यह सिद्धान्त केवल एक ही बात पर टिका हुआ था, वह था की पाणिनिजी ने अष्टाध्यायी में "यवनानि" शब्द मिला है जिसका अर्थ ज्यादातर विद्धवान बताते है "यवनो की लिपि" या "यवनी स्त्री"। महर्षि पतंजलि ने यवनानि शब्द का अर्थ "यवनो की लिपि" बताया है, तो मैं भी इसी बात के साथ चलता हु।
चुकी पाणिनिजी तक्षिला में ज्ञानप्राप्ति के लिए गए थे और तक्षिला में विश्वभर से लोग आते थे तो शायद पाणिनिजी को किसी यवनी से ही उनकी लिपि के बारे में पता चला होगा।

चुकी मैं भी पश्चिमी इतिहासकारो के इतिहास पर विश्वास नहीं रखता तो मैंने सोचा की इन साहब की बातें सुन कर देख लेते है।
उन सज्जन ने एक वीडियो बनाया था जिसके अनुसार गांधार में यवनो का शासन था, तब पाणिनि जी ने उनसे उनका व्याकरण सीखा और उसका उपयोग अष्टाध्यायी की रचना के लिए किया।

वीडियो शुरू हुए 1 मिनट भी नहीं हुआ था की मैंने वीडियो रोका और उन साहब से पूछा: " पाणिनि जी के काल में यवनी भारत में थे ही नहीं, वे तो बाद में आये थे सिकंदर के आने के बाद।"
मैंने वीडियो देखना शुरू किया तो उसमे आया की पाणिनि जी ने अष्टाध्यायी में यवनानि शब्द का उपयोग किया है, साथ ही पाणिनि से पहले सस्कृत का कुछ अता पता ही था, वह तो Lingua Franca था। Lingua Franca उस भाषा को कहते है जो दो व्यक्तियो के लिए वार्तालाप के उपयोग में आता है जब वे दोनों एक दूसरे की भाषा समझ नहीं सकते, उधारण: अंग्रेजी ।

अगले दिन उन साहब का रिप्लाय आया, उन्होंने कहा: "यवनी पाणिनि से पहले से गांधार में रह रहे थे। फारसियों ने गांधार विजय के बाद वहा यवनियो को बसाया था।"

तो मैंने रिप्लाय किया: " यवनी तो फारसियों के दुश्मन थे तो वे अपने ही दुश्मन को अपने ही राज्य में क्यों बसाएंगे?

तो वे महाशय बोले: "तुम्हे किसी चीज़ का ज्ञान नहीं है वगेरा वगेरा।"

तो मैंने उन्हें लिखा: "आपको ही किसी चीज़ का ज्ञान नहीं है, आप केवल नस्लवाद फैला रहे है और अश्वेतों का झूठा इतिहास फैला रहे है। किसी भी फ़ारसी लेख में इस बात का ज़िक्र नहीं है की उन्होंने यूनानियो को गांधार में बसाया था। पाणिनि ने यह बात कही नहीं कही है की उन्होंने यवनो से ज्ञान प्राप्त किया है और तब संस्कृत का निर्माण किया। पाणिनि महाजनपदों का उल्लेख किया है पर किसी यवन देश का नहीं, उन्होंने सिंधु घंटी में लगभग 500 गाँवो का उल्लेख किया है पर किसी भी यवनी बस्ती का नहीं। सिकंदर के इतिहासकारो ने भारत में किसी यवन बस्ती का उल्लेख नहीं किया।( प्लुटार्च ने लिखा था की भारत में यवनो की कुछ बस्तिया थी जब सिकंदर वहा आया था, पर प्लुटार्च सिकंदर के मारने के लगभग 300 वर्ष बाद पैदा हुआ था तो उसकी बातों को सही नहीं मान सकते।)"

तब उनका रिप्लाय आया: "मैंने कब कहा की पाणिनि ने सस्कृत का निर्माण किया है, मैंने कहा की पाणिनि ने यूनानी भाषा से ससंस्कृत व्याकरण का निर्माण किया।"

मैंने जवाब दिया: "पाणिनि ने संस्कृत व्याकरण का निर्माण नहीं किया अपितु उसमे कई सुधार किये। पाणिनि से पहले कई वैयाकरण हुए जैसे की यास्क आदि, तो यह कहना की पाणिनि ने संस्कृत के व्याकरण का निर्माण किया यह गलत है।" (यह महाशय अपने वीडियो में कह चुके है की पाणिनि ने संस्कृत का निर्माण किया पर बाद में पलट गए।)

उनका जवाब: "मैंने यह नहीं कहा की संस्कृत व्याकरण का निर्माण पाणिनि ने किया( यह व्यक्ति दुबारा से पलट गया), मैंने कहा उन्होंने यवनी व्याकरण का उपयोग संस्कृत में किया। और संस्कृत का 500 ईसापूर्व से पहले कोई अस्तित्व ही नहीं था और नाही इसका कोई साबुत है।"

मैंने जवाब दिया: "भाई यहाँ बात यवनी भाषा की हो रही है और आप संस्कृत पर आ टपके, पर आपकी कही बात गलत है। मित्तानि साम्राज्य और हित्तिते साम्राज्य के बिच में हुए संधि पत्र में इंद्र,वरुण,अग्नि आदि देवो का उल्लेख है जो सिद्ध करता है की संस्कृत 1500 उसपूर्व से भी पुरानी है।"

मैं एक के बाद एक जवाब दिए जा रहा था और उसके नसलवादि सिद्धान्तों की धज्जिया उड़ा रहा था।वह इतना तिलमिलिया की उसके अगले जवाब में उसका गुस्सा नज़र आ रहा था।

उसने भेजा: "आर्य नस्ल के लोग 1000 ईसापूर्व पहले भारत आये थे और उन्होंने द्रविड़ों के नगरो को ध्वस्त कर दिया था। भारतीय पुरातत्वशास्त्री बी.बी.लाल ने भी कहा है की आर्य भूरे मृद्भांड संस्कृति( Painted Grey Ware Culture) से तालुक रखते थे। साबित करो संस्कृत 4000 ईसापूर्व पुरानी है।"

मैं समझ गया की यह बंदा बात पलटने की कोशिश कर रहा है, मैंने उसे लिख भेजा: " भाई मैंने कब दावा किया की संस्कृत 4000 ईसापूर्व पुरानी है जो में साबित करू। मैं तुम्हे कई सबूत दे चूका हु की तुम्हारी बातें गलत है और वे केवल नस्लवादी है। तुम मुझे सबूत अपने सिद्धान्त को सिद्ध करने के लिए।"

उनका जवाब: "पाणिनि ने अष्टाध्यायी में यवनानि शब्द का उपयोग किया है।"

यह पड़कर मुझे काफी गुस्सा आया। मैं पहले ही साबित कर चूका था की यवनी पाणिनि के काल में थे ही नहीं फिर भी यह मुर्ख उसी बात पर टिक हुआ है। मैंने फैसला किया की मैं अब इसे उत्तर नहीं दूंगा क्योंकि मैं इसके सवालो के जवाब दे चूका हु और दुबारा देकर क्या फायदा जब इस व्यक्ति के मस्तिक्ष में कुछ जाये ही नहीं। यह व्यक्ति अपने काल्पनिक दुनिया में रहता है और मेरे समझाने का इसपर कोई असर नहीं होगा।

जय माँ भारती।

Saturday, March 7, 2015

गौतम बुद्ध का काल ( Date of Gautam Buddha)

नेपाल में लुम्बिनी में 2013 में पुरातत्वविदो को एक छोटा मंदिर मिला है जिसकी छत नहीं थी और उसके मध्य में बोधि वृक्ष था ।
पुरातत्वविदो के अनुसार कार्बन डेटिंग से उस मंदिर के निर्माण का काल 550 ईसापूर्व आया है ,यानि की विश्व का सबसे प्राचीन बोध मंदिर ।
माना जाता था की पुरे भारतीय उप महाद्वीप पर बोद्ध मंदिर और मठो का निर्माण गौतम बुद्ध की मृत्यु के बाद बने थे ।
अजातशत्रु और सम्राट अशोक ने गौतम बुद्ध के निर्वाण प्राप्ति के बाद कई मंदिर बनवाये थे और गुप्त राजाओ ने भी इसमें अपना योगदान दिया था ।
मध्यधारा के इतिहासकार मानते है कि 480 ईसापूर्व में गौतम बुद्ध जन्मे थे और कुछ के अनुसार 560 ईसापूर्व ।पर यदि उस मंदिर का काल 550 ईसापूर्व है तो या तो वह मंदिर गौतम बुद्ध के जीवित रहते बना या फिर उनकी मृत्यु के बाद ।
बोद्ध ग्रंथो के अनुसार तो बोद्ध मंदिर और मठ तो गौतम बुद्ध की मृत्यु के बाद हुआ और यह मैं पहले ही बता चूका हु यानि कि गौतम बुद्ध जन्मे होंगे 630 ईसापूर्व में । गौतम बुद्ध 80 वर्ष जिए तो यदि उनकी मृत्यु 550 ईसापूर्व के आस पास हुई तो 550+80 होगा 630 ।

मैं पुराणों में वर्णित गौतम बुद्ध के जन्म काल को मानता हु जो कि है 1800 ईसापूर्व ।
यह पोस्ट कर मैं यह बताना चाहता हु कि पश्चिमी मान्यता गौतम बुद्ध को लेकर और भारतीय सभ्यता को लेकर काफी गलत है ।

अब शुरू होती है असली गड़बड़

बोद्ध ग्रंथो के अनुसार गौतम बुद्ध की मृत्यु के 218 वर्ष बाद अशोक मौर्य का राज्याभिषेक हुआ था और पश्चिमी मान्यता अनुसार अशोक का राज्याभिषेक 268 ईसापूर्व में हुआ ।
यानि कि यदि गौतम बुद्ध कि मृत्यु 550 ईसापूर्व में हुई तो अशोक का राज्याभिषेक 332 ईसापूर्व में हुआ । साथ ही अशोक जब सम्राट बना तो उसके चार वर्ष बाद उसका राज्याभिषेक हुआ था अर्थात अशोक 336 ईसापूर्व में मगध के सिंहासन पर बैठा ।

अब बड़ी गड़बड़ यह है कि सिकंदर ने भारत पर आक्रमण 326 ईसापूर्व में किया तो उस समय भारत पर शासन करने वाला सम्राट नन्द न होकर अशोक था । सिकंदर को तब भारत के सम्राट के बारे में बताया जाता है कि भारत का सम्राट एक निर्दयी और क्रूर सम्राट है और प्रजा में अप्रिय भी है । अब कुछ लोग कहेंगे कि कलिंग युद्ध से पूर्व अशोक एक क्रूर शासक था और प्रजा उसे चंदाशोक कहती थी पर यह गलत है ।
अशोक का साम्राज्य ईरान तक था न कि आज के राजस्थान तक जैसा कि यूनानी लेख कहते है ।
अब या तो पश्चिमी विद्वानों की तिथिया गलत है या फिर सिकंदर कभी भारत तक आया ही नहीं ,बस केवल ईरान तक पहोचकर वापस चला गया अशोक के बारे में सुनकर। और यवनी अपने देवता रूपी सम्राट की हार देख नहीं पाए और झेलम नदी के युद्ध की कहानी गड़ दी ,ऐसे तो सिकंदर के सिक्के आज तक कभी भारत में या सिंधु घाटी में मिले नहीं आज तक ।

यह तो तय है कि पश्चिमी विद्वानों को भारतीय उप  महाद्वीप का इतिहास दुबारा लिखना पड़ेगा अब ।

जय माँ भारती ।

Thursday, October 16, 2014

इसाई क्रॉस की नॉर्स उत्पत्ति ( Norse origin of Christian Cross )

क्रॉस या सूली इसाई धर्म का प्रसिद्ध चिन्ह है और इसाई धर्म की यही पहचान है। कहते है की रोमन सम्राट कांस्तान्तैन ने एक युद्ध के दौरान आसमान में सूली या क्रॉस नज़र आया जिसके बाद उसने इसाई धर्म अपना लिया था।
पर यह बात बड़ी विचित्र लगती है की इसाईयो ने उस सूली को अपना चिन्ह क्यों बनाया जिसपर इसाह मसीह की मृत्यु हुई थी?
इसका कारण है की इसाई धर्म  ने अपने समकालीन अन्य धर्मो के चिन्ह अपना लिए जिस कारण वे जन साधारण तक पहोच पाए।

आज यदि हम देखे तो कई लोग आपको गले में क्रॉस का लॉकेट पहने देखेंगे, कुछ तो केवल फैशन के लिए पहनते है पर अधिकतर उन लोगो में इसाई होते है।
गले में क्रॉस देख आप पहचान सकते है कि वह व्यक्ति इसाई है। पर क्रॉस का लॉकेट पहनना और स्वयं क्रॉस की उत्पत्ति इसाई धर्म के समकालीन धर्म नॉर्स धर्म से है।

नॉर्स धर्म
नॉर्स लोग या वाइकिंग लोग उत्तर यूरोपीय लोग थे जो 7वी सदी इसवी के बाद सामने आये। यह लोग आर्य भाषा, नॉर्स भाषा बोलते थे। इनके धर्म को नॉर्स धर्म कहा जाता है जिसका प्रमुख देवता था ओडिन, जो की देवताओ का राजा था। ओडिन का पुत्र थुनार जिसे आज थोर के नाम से जानते है वो वर्षा और बिजली का देवता था। अपने बिजली के हथोड़े से वह अपने शत्रुओ पर बिजली गिराता और उन्हें नष्ट करता।
नॉर्स योद्धा समुदाय के लोग थे और उनके देवता भी योद्धा ही थे। युद्ध में जाने से पहले या अन्य राज्य पर हमला करने से पहले वे अपने देवताओ से प्राथना करते और  थोर के हथोड़े का लॉकेट पहनते थे। उनके अनुसार उस लॉकेट में थोर का आशीर्वाद था और थोर उनकी रक्षा करेंगे। इस कदर का लॉकेट सामान्य नॉर्स व्यक्ति भी पहनता था।

नॉर्स लोगो ने अपने सैन्य अभियानों के दौरान डेनमार्क,स्वीडन,फ्रांस,ब्रिटेन,रूस और कुछ अन्य उत्तर यूरोपीय देशो में अपनी बस्ती बसाई। इस कारण उनका धर्म और उनकी संस्कृति लगभग सम्पूर्ण यूरोप में फैली।
थोर के हथोड़े का लॉकेट आज हमें यूरोप में कई जगह मिलते है।
लगभग 13वी सदी इसवी तक वाइकिंग या नॉर्स लोगो के राज्य पूरी तरह से इसाई बन चुके थे। इसाई बनने के बाद नॉर्स लोगो की कई प्रथाओ और रिवाजो को इसाई धर्म ने अपने अन्दर समा लिया जिसमे थोर के हथोड़े का लॉकेट भी शामिल था।
थोर के हथोड़े का लॉकेट लगभग इसाई क्रॉस की तरह ही दिखता है, चुकी थोर के हथोड़े का लॉकेट नॉर्स लोगो के लिए सामान्य बात थी इसीलिए इसाई बने वाइकिंग क्रॉस के लॉकेट को धारण करने लगे।
इसाई बनने के बाद वाइकिंग राजवंशी और योद्धा नाइट कहलाये। पोप के आदेशानुसार ये नाइट्स जेरूसलम को इसाईयो के अधीन करने गए और क्रूसेडर्स कहलये।
अपने पूर्वजो की तरह, जो कि अपने साथ थोर का हथोड़ा लेकर जाते थे ये नाइट्स अपने साथ क्रूसेड (क्रॉस) लेकर गए थे।

इसाई धर्म एक ऐसा धर्म है जो कई अन्य धर्मो की शिक्षाओ, निति, रिवाज आदि से मिलकर बना। इसका सबसे अच्छा उधारण वह क्रॉस है। /div>
इसाई बनने के बाद वाइकिंग राजवंशी और योद्धा नाइट कहलाये। पोप के आदेशानुसार ये नाइट्स जेरूसलम को इसाईयो के अधीन करने गए और क्रूसेडर्स कहलये।
अपने पूर्वजो की तरह, जो कि अपने साथ थोर का हथोड़ा लेकर जाते थे ये नाइट्स अपने साथ क्रूसेड (क्रॉस) लेकर गए थे।

सोत्र: http://www.ancient-origins.net/news-history-archaeology/discovery-hammer-thor-artifact-solves-mystery-viking-amulets-001819

जय माँ भारती

Saturday, June 21, 2014

प्रोटो इंडो यूरोपियन भाषा का मिथक (Myth of the Proto Indo European Language)

पश्चिमी भाषावैज्ञानिक और इतिहासकारों ने यह पाया की यूनानी ,लैटिन और संस्कृत में कई समानता है और इन तीनो भाषाओ की एक ही जननी है जिसे इन्होने प्रोटो इंडो यूरोपियन यानि हिंदी में आदिम या प्राचीन हिंद यूरोपीय भाषा कहते है ।
पश्चिमी इतिहासकारों का मानना है की पश्चिम यूरोप और मध्य एशिया की सीमा के आसपास रहने वाले लोग प्रोटो इंडो यूरोपियन बोलते थे ,फिर वे लोग अलग अलग बट गए और कई अन्य भाषाओ में बदल गए और प्रोटो इंडो यूरोपियन विलुप्त हो गई । अब कई वर्ष तक संस्कृत पर काम करने के बाद भाषावैज्ञानिको ने प्रोटो इंडो यूरोपियन को दुबारा बना लिया है ,क्युकी संस्कृत अन्य आर्य भाषाओ में प्रोटो इंडो के सबसे करीबी है इसीलिए उसे चुना गया ।
पर इस सिधांत में कई खामिया है । मैं कोई भाषा वैज्ञानिक नहीं हु और इस बारे में ज्यादा नहीं जनता ,पर जितना जनता हु उसी से इन पश्चिमी इतिहासकारों की पोल खोलूँगा ।
सच यह है की संस्कृत ही सभी भाषाओ की जननी है और हिमालय आर्यों की जन्मभूमि ।प्रोटो इंडो यूरोपियन जैसी कोई भाषा ही नहीं है, अब जब प्रोटो इंडो यूरोपीय भाषा लुप्त हो चुकी है तो आपको कैसे पता की संस्कृत उसके सबसे करीबी है ?? और यदि प्रोटो इंडो यूरोपीय भाषा थी और संस्कृत उसके करीबी है तो प्रोटो इंडो यूरोपियन भाषा का गढ़ भारत होना चाहिए ,क्युकी पश्चिम यूरोप और मध्य एशिया की भाषाए प्रोटो इंडो से दूर है तो साफ़ है की आर्य भारत से निकले और कास्पियन सागर जो मध्य एशिया और पश्चिमी यूरोप के पास है वहा बसे ,अब उन्हें वहा पहोचने के लिए कई वर्ष लगे इसीलिए उनकी भाषाओ में कई विकृतिया आई गई और वह प्रोटो इंडो यूर्प्पियन भाषा से अलग हो गई ।

पश्चिमी इतिहासकारों को यह बिलकुल पसंद नहीं की उनके पूर्वज भारत के हो । ईसायत और इस्लाम मे उत्तर अफ्रीका से लेकर इराक तक के भाग को इश्वर का बाग़ यानी ईडन गार्डन कहा गया है जहा आदम रहा था ,और पश्चिमी इतिहासकार या तो इसाई है या मुस्लमान इसीलिए उन्होंने अफ्रीका को मानव के जन्म का स्थान बताया है ।

पश्चिमी इतिहासकार और भाषावैज्ञानिको को संस्कृत का बहोत कम ज्ञान है और कई लोगो ने तो संस्कृत में पीएचडी तक की है ,पर फिर भी संस्कृत के मामले में वे लोग पिछड़े हुए है ।
अब मैं आपको बताऊंगा की अपने संस्कृत के कम ज्ञान के सहारे भाषावैज्ञानिको ने जिस प्रोटो इंडो यूरोपियन भाषा का निर्माण किया है वह कई खामियों से भरी पड़ी है ।
भाषावैज्ञानिको ने ऋग्वेद के द्यौस ,यूनानी ज़ीउस और रोम के जुपिटर में समानता देखि और इस निर्णय पर आये की ये तीनो एक ही शब्द से उत्पन्न हुए है ,जो की प्रोटो इंडो यूरोपियन शब्द द्येउस (Dyeus) से है और संस्कृत का द्यौस उसका सबसे करीबी है ।

प्रोटो इंडो यूरोपियन भाषा सुनने के लिए यहाँ क्लिक करे : प्रोटो इंडो यूरोपियन 

भाषावैज्ञानिको ने यह पाया की ज़ीउस ,जुपिटर और द्यौस तीनो ही देवताओ के राजा है (ग्रिफ्फित के अनुवाद अनुसार ), पर ऋग्वैदिक मंत्रो में द्यौस पिता को कही भी देवताओ का राजा नहीं कहा गया ,यह केवल भाषावैज्ञानिको का अनुमान था | यदि आप ग्रिफ्फित का ऋग्वेद का अनुवाद पड़े तो ऋग्वेद का मंडल 4 सूक्त 17 का मंत्र 4 के अनुसार द्यौस पिता इंद्र के पिता है और यदि हम आर्य समाज जामनगर  का अनुवाद पड़े इसी मंत्र का तो उसके अनुसार द्यौस का अर्थ शूरवीर है | जबकि हम दुबारा ग्रिफ्फित का अनुवाद देखे और उसमे पुरुष सूक्त देखे तो उसके अनुसार इंद्र पुरुष के नेत्र से उत्पन्न हुए है तो द्यौस पुरुष के माथे से , अर्थात इंद्र द्यौस के पुत्र नहीं ,और यदि आर्य समाज जामनगर  अनुवाद ले तो यहाँ द्यौस का अर्थ आकाश लोक है |
आर्य समाज जामनगर ,ऋग्वेद मंडल 10 सूक्त ९० मंत्र 14 

जब आर्य अभारत से बहार गए तो धीरे धीरे उन्होंने अपना नया धर्म बनाया ,प्राचीन ,फिर प्राचीन इराक यानि सुमेरिया में पुत्र अपने पिता की हत्या कर सिंहासन पर बैठने लगे, राजा द्वारा किये गए इस पाप को छुपाने के लिए कवियों ने एक कहानी गड़ी की जब देवता पापी हो जाते तो उनके पुत्र उनकी हत्या कर गद्दी पर बैठते और न्याय को सदा कायम रखते |
अब यही कहानी कई देशो में गई ,ज़ीउस ने भी अपने पिता क्रोनुस की और जुपिटर ने अपने पिता सैटर्न की हत्या की थी | पश्चिमी भाषावैज्ञानिको ने यही सोचा की द्यौस इंद्र का पिता है और इंद्र भी अपने पिता की हत्या कर देवताओ का राजा बना |
असल में यह बृहस्पति है जो यूनान में ज़ीउस बना और रोम में जुपिटर ,बृहस्पति और जुपिटर दोनों ही बृहस्पति ग्रह से जुड़े हुए है और ज़ीउस ,जुपिटर और बृहस्पति यह तीनो शब्द एक दुसरे से मिलते जुलते है ।

तो भाषावैज्ञानिको ने जिस द्यौस के आधार  पर प्रोटो इंडो यूरोपियन शब्द द्येउस (Dyeus) वह गलत है | इससे हम यह अनुमान लगा सकते है इनकी बनाई 70% भाषा गलत है |

जय माँ भारती