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Saturday, June 21, 2014

प्रोटो इंडो यूरोपियन भाषा का मिथक (Myth of the Proto Indo European Language)

पश्चिमी भाषावैज्ञानिक और इतिहासकारों ने यह पाया की यूनानी ,लैटिन और संस्कृत में कई समानता है और इन तीनो भाषाओ की एक ही जननी है जिसे इन्होने प्रोटो इंडो यूरोपियन यानि हिंदी में आदिम या प्राचीन हिंद यूरोपीय भाषा कहते है ।
पश्चिमी इतिहासकारों का मानना है की पश्चिम यूरोप और मध्य एशिया की सीमा के आसपास रहने वाले लोग प्रोटो इंडो यूरोपियन बोलते थे ,फिर वे लोग अलग अलग बट गए और कई अन्य भाषाओ में बदल गए और प्रोटो इंडो यूरोपियन विलुप्त हो गई । अब कई वर्ष तक संस्कृत पर काम करने के बाद भाषावैज्ञानिको ने प्रोटो इंडो यूरोपियन को दुबारा बना लिया है ,क्युकी संस्कृत अन्य आर्य भाषाओ में प्रोटो इंडो के सबसे करीबी है इसीलिए उसे चुना गया ।
पर इस सिधांत में कई खामिया है । मैं कोई भाषा वैज्ञानिक नहीं हु और इस बारे में ज्यादा नहीं जनता ,पर जितना जनता हु उसी से इन पश्चिमी इतिहासकारों की पोल खोलूँगा ।
सच यह है की संस्कृत ही सभी भाषाओ की जननी है और हिमालय आर्यों की जन्मभूमि ।प्रोटो इंडो यूरोपियन जैसी कोई भाषा ही नहीं है, अब जब प्रोटो इंडो यूरोपीय भाषा लुप्त हो चुकी है तो आपको कैसे पता की संस्कृत उसके सबसे करीबी है ?? और यदि प्रोटो इंडो यूरोपीय भाषा थी और संस्कृत उसके करीबी है तो प्रोटो इंडो यूरोपियन भाषा का गढ़ भारत होना चाहिए ,क्युकी पश्चिम यूरोप और मध्य एशिया की भाषाए प्रोटो इंडो से दूर है तो साफ़ है की आर्य भारत से निकले और कास्पियन सागर जो मध्य एशिया और पश्चिमी यूरोप के पास है वहा बसे ,अब उन्हें वहा पहोचने के लिए कई वर्ष लगे इसीलिए उनकी भाषाओ में कई विकृतिया आई गई और वह प्रोटो इंडो यूर्प्पियन भाषा से अलग हो गई ।

पश्चिमी इतिहासकारों को यह बिलकुल पसंद नहीं की उनके पूर्वज भारत के हो । ईसायत और इस्लाम मे उत्तर अफ्रीका से लेकर इराक तक के भाग को इश्वर का बाग़ यानी ईडन गार्डन कहा गया है जहा आदम रहा था ,और पश्चिमी इतिहासकार या तो इसाई है या मुस्लमान इसीलिए उन्होंने अफ्रीका को मानव के जन्म का स्थान बताया है ।

पश्चिमी इतिहासकार और भाषावैज्ञानिको को संस्कृत का बहोत कम ज्ञान है और कई लोगो ने तो संस्कृत में पीएचडी तक की है ,पर फिर भी संस्कृत के मामले में वे लोग पिछड़े हुए है ।
अब मैं आपको बताऊंगा की अपने संस्कृत के कम ज्ञान के सहारे भाषावैज्ञानिको ने जिस प्रोटो इंडो यूरोपियन भाषा का निर्माण किया है वह कई खामियों से भरी पड़ी है ।
भाषावैज्ञानिको ने ऋग्वेद के द्यौस ,यूनानी ज़ीउस और रोम के जुपिटर में समानता देखि और इस निर्णय पर आये की ये तीनो एक ही शब्द से उत्पन्न हुए है ,जो की प्रोटो इंडो यूरोपियन शब्द द्येउस (Dyeus) से है और संस्कृत का द्यौस उसका सबसे करीबी है ।

प्रोटो इंडो यूरोपियन भाषा सुनने के लिए यहाँ क्लिक करे : प्रोटो इंडो यूरोपियन 

भाषावैज्ञानिको ने यह पाया की ज़ीउस ,जुपिटर और द्यौस तीनो ही देवताओ के राजा है (ग्रिफ्फित के अनुवाद अनुसार ), पर ऋग्वैदिक मंत्रो में द्यौस पिता को कही भी देवताओ का राजा नहीं कहा गया ,यह केवल भाषावैज्ञानिको का अनुमान था | यदि आप ग्रिफ्फित का ऋग्वेद का अनुवाद पड़े तो ऋग्वेद का मंडल 4 सूक्त 17 का मंत्र 4 के अनुसार द्यौस पिता इंद्र के पिता है और यदि हम आर्य समाज जामनगर  का अनुवाद पड़े इसी मंत्र का तो उसके अनुसार द्यौस का अर्थ शूरवीर है | जबकि हम दुबारा ग्रिफ्फित का अनुवाद देखे और उसमे पुरुष सूक्त देखे तो उसके अनुसार इंद्र पुरुष के नेत्र से उत्पन्न हुए है तो द्यौस पुरुष के माथे से , अर्थात इंद्र द्यौस के पुत्र नहीं ,और यदि आर्य समाज जामनगर  अनुवाद ले तो यहाँ द्यौस का अर्थ आकाश लोक है |
आर्य समाज जामनगर ,ऋग्वेद मंडल 10 सूक्त ९० मंत्र 14 

जब आर्य अभारत से बहार गए तो धीरे धीरे उन्होंने अपना नया धर्म बनाया ,प्राचीन ,फिर प्राचीन इराक यानि सुमेरिया में पुत्र अपने पिता की हत्या कर सिंहासन पर बैठने लगे, राजा द्वारा किये गए इस पाप को छुपाने के लिए कवियों ने एक कहानी गड़ी की जब देवता पापी हो जाते तो उनके पुत्र उनकी हत्या कर गद्दी पर बैठते और न्याय को सदा कायम रखते |
अब यही कहानी कई देशो में गई ,ज़ीउस ने भी अपने पिता क्रोनुस की और जुपिटर ने अपने पिता सैटर्न की हत्या की थी | पश्चिमी भाषावैज्ञानिको ने यही सोचा की द्यौस इंद्र का पिता है और इंद्र भी अपने पिता की हत्या कर देवताओ का राजा बना |
असल में यह बृहस्पति है जो यूनान में ज़ीउस बना और रोम में जुपिटर ,बृहस्पति और जुपिटर दोनों ही बृहस्पति ग्रह से जुड़े हुए है और ज़ीउस ,जुपिटर और बृहस्पति यह तीनो शब्द एक दुसरे से मिलते जुलते है ।

तो भाषावैज्ञानिको ने जिस द्यौस के आधार  पर प्रोटो इंडो यूरोपियन शब्द द्येउस (Dyeus) वह गलत है | इससे हम यह अनुमान लगा सकते है इनकी बनाई 70% भाषा गलत है |

जय माँ भारती

Thursday, March 27, 2014

स्वामी दयानंद का इतिहास चिंतन

स्वामी दयानंद का इतिहास चिंतन
क्रांतिगुरु स्वामी दयानंद के विशाल
चिंतन में एक महत्वपूर्ण कड़ी इतिहास
रुपी मिथ्या बातों का खंडन एवं सत्य
इतिहास का शंखनाद हैं।
स्वामी जी का भागीरथ प्रयास
था कि विदेशी इतिहासकारों द्वारा
अपने स्वार्थ हित एवं ईसाइयत के
पोषण के लिए विकृत इतिहास द्वारा
भारत वासियों को असभ्य, जंगली,
अंधविश्वासी आदि सिद्ध करने के लिए
किया जा रहा था उसे न केवल सप्रमाण
असत्य सिद्ध करे अपितु उसके स्थान पर
सत्य इतिहास कि स्थापना कर भारत
वासियों को संसार कि श्रेष्ठतम,
वैज्ञानिक, अध्यात्मिक रूप से सबसे
उन्नत एवं प्रगतिशील सिद्ध करे।
इसी कड़ी में स्वामी जी द्वारा अनेक
तथ्य अपनी लेखनी द्वारा प्रस्तुत किये
गये जिन पर आधुनिक रूप से शौध कर
उन्हें संसार के समक्ष सिद्ध कर
अनुसन्धान कर्ताओं कि सोच को बदलने
कि कि अत्यंत आवश्यकता हैं।
स्वामी जी द्वारा स्थापित कुछ
इतिहास अन्वेषण तथ्यों को यहाँ पर
प्रस्तुत कर रहे हैं।
१. आर्य लोग बाहर से आये हुए
आक्रमणकारी नहीं थे, जिन्होंने
यहाँ पर आकर यहाँ के मूल
निवासियों पर जय पाकर उन पर
राज्य किया था। वे यही के मूल
निवासी थे और इस देश का नाम
आर्यव्रत था।
२. वेदों में आर्य दस्यु युद्ध
का किसी भी प्रकार का कोई उल्लेख
नहीं हैं और यह नितांत कल्पना हैं
क्यूंकि वेद इतिहास पुस्तक नहीं हैं।
३. प्राचीन काल में
नारी जाति अशिक्षित एवं घर में चूल्हे
चौके तक सिमित न रहने वाली होकर
गार्गी, मैत्रयी जैसी महान
विदुषी एवं शास्त्रार्थ करने
वाली थी। वेदों में तो मंत्र
द्रष्टा ऋषिकाओं का भी उल्लेख
मिलता हैं।
४. वेदों में एक ईश्वर कि पूजा और
अर्चना का विधान हैं। एक ईश्वर के
अनेक गुणों के कारण अनेक नाम हो सकते
हैं और यह सभी नाम गुणवाचक हैं मगर
इसका अर्थ यह हैं कि ईश्वर एक हैं और
अनेक गुणों द्वारा जाना जाता हैं।
५. वेदों का उत्पत्ति काल २०००-३०००
वर्ष नहीं हैं अपितु सूर्य सिद्धांत
शिरोमणि ग्रंथों के आधार पर
अरबों वर्ष पुराना हैं।
६. रामायण, महाभारत आदि काल्पनिक
ग्रन्थ नहीं हैं अपितु राजा परीक्षित
के पश्चात आर्य राजाओं कि प्राप्त
वंशावली से सिद्ध होता हैं कि वह
सत्य इतिहास हैं।
७. श्री कृष्ण का जो चरित्र महाभारत
में वर्णित हैं वह आपत अर्थात श्रेष्ठ
पुरुषों वाला हैं। अन्य सब गाथायें
मनगढ़त एवं असत्य हैं।
८. पुराणों के रचियता व्यास
जी नहीं हैं अपितु पंडितों ने
अपनी अपनी बातें इसमें
मिला दी थी और व्यास जी का नाम
रख दिया था।
९. रामायण, महाभारत, मनु
स्मृति आदि में जो कुछ वेदानुकूल हैं वह
मान्य हैं प्रक्षिप्त अर्थात
मिलावटी हैं।
१०. वैदिक ऋषि मन्त्रों के
रचियता नहीं अपितु मंत्र द्रष्टा थे।
११. वेदों में यज्ञों में पशु बलि एवं
माँसाहार आदि का कोई विधान
नहीं हैं। वेदों कि इस प्रकार
कि व्याख्या मध्य कालीन
पंडितों का कार्य हैं जो वाममार्ग से
प्रभावित थे।
१२. मूर्ति पूजा कि उत्पत्ति जैन मत
द्वारा आरम्भ हुई थी। न वेदों में और न
ही इससे पूर्व काल में
मूर्ति पूजा का कोई प्रचलन था।
१३. वेदों में जादू टोना,काला जादू
आदि का कोई विधान नहीं हैं। यह सब
मनघड़त कल्पनाएँ हैं।
१४. वेदों में अश्लीलता आदि का कोई
वर्णन नहीं हैं। यह सब मनघड़त
कल्पनाएँ हैं।
१५. सृष्टि कि उत्पत्ति के काल में बहुत
सारे युवा पुरुष और
नारी का त्रिविष्टप पर
अमैथुनी प्रक्रिया से जन्म हुआ था और
चार ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य एवं
अंगिरा को ह्रदय में ईश्वर
द्वारा वेदों का ज्ञान प्राप्त
करवाया गया था।
१६. वेदों का ज्ञान बहुत काल तक
श्रवण परम्परा द्वारा सुरक्षित रहा,
कालांतर में इक्ष्वाकु के काल में
वेदों को सर्वप्रथम लिखित रूप में
उपलब्ध करवाया गया था।
१७. आर्य वैदिक सभ्यता प्राचीन काल
में सम्पूर्ण विश्व में प्रचलित थी और
आर्यव्रत देश संसार का विश्व गुरु था।
१८. प्राचीन काल में विदेश गमन पर
कोई प्रतिबन्ध नहीं था और न
ही विदेश जाने से कोई भी धर्म से च्युत
हो जाता था।
१९. शुद्धि आदि का विधान गोभिल
आदि ग्रंथों में विद्यमान था इसलिए
जो भी कोई वैदिक धर्म त्याग कर
विधर्मी हो चुके हैं उन्हें वापिस
स्वधर्मी बनाया जा सकता हैं।
२०. गुजरात के सोमनाथ में
मुसलमानों कि विजय का कारण
मूर्ति पूजा एवं अवतारवाद से सम्बंधित
पाखंड था नाकि हिंदुओं में
वीरता कि कमी था।
ऐसे और उदहारण देकर एक पूरी पुस्तक
लिखी जा सकती हैं जिसका उद्देश्य
स्वामी दयानंद को अपने समय का सबसे
बड़े इतिहासकार, अनुसन्धान कर्ता के
रूप में सिद्ध करना होगा।

डॉ विवेक आर्य

जय माँ भारती