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Saturday, June 21, 2014

प्रोटो इंडो यूरोपियन भाषा का मिथक (Myth of the Proto Indo European Language)

पश्चिमी भाषावैज्ञानिक और इतिहासकारों ने यह पाया की यूनानी ,लैटिन और संस्कृत में कई समानता है और इन तीनो भाषाओ की एक ही जननी है जिसे इन्होने प्रोटो इंडो यूरोपियन यानि हिंदी में आदिम या प्राचीन हिंद यूरोपीय भाषा कहते है ।
पश्चिमी इतिहासकारों का मानना है की पश्चिम यूरोप और मध्य एशिया की सीमा के आसपास रहने वाले लोग प्रोटो इंडो यूरोपियन बोलते थे ,फिर वे लोग अलग अलग बट गए और कई अन्य भाषाओ में बदल गए और प्रोटो इंडो यूरोपियन विलुप्त हो गई । अब कई वर्ष तक संस्कृत पर काम करने के बाद भाषावैज्ञानिको ने प्रोटो इंडो यूरोपियन को दुबारा बना लिया है ,क्युकी संस्कृत अन्य आर्य भाषाओ में प्रोटो इंडो के सबसे करीबी है इसीलिए उसे चुना गया ।
पर इस सिधांत में कई खामिया है । मैं कोई भाषा वैज्ञानिक नहीं हु और इस बारे में ज्यादा नहीं जनता ,पर जितना जनता हु उसी से इन पश्चिमी इतिहासकारों की पोल खोलूँगा ।
सच यह है की संस्कृत ही सभी भाषाओ की जननी है और हिमालय आर्यों की जन्मभूमि ।प्रोटो इंडो यूरोपियन जैसी कोई भाषा ही नहीं है, अब जब प्रोटो इंडो यूरोपीय भाषा लुप्त हो चुकी है तो आपको कैसे पता की संस्कृत उसके सबसे करीबी है ?? और यदि प्रोटो इंडो यूरोपीय भाषा थी और संस्कृत उसके करीबी है तो प्रोटो इंडो यूरोपियन भाषा का गढ़ भारत होना चाहिए ,क्युकी पश्चिम यूरोप और मध्य एशिया की भाषाए प्रोटो इंडो से दूर है तो साफ़ है की आर्य भारत से निकले और कास्पियन सागर जो मध्य एशिया और पश्चिमी यूरोप के पास है वहा बसे ,अब उन्हें वहा पहोचने के लिए कई वर्ष लगे इसीलिए उनकी भाषाओ में कई विकृतिया आई गई और वह प्रोटो इंडो यूर्प्पियन भाषा से अलग हो गई ।

पश्चिमी इतिहासकारों को यह बिलकुल पसंद नहीं की उनके पूर्वज भारत के हो । ईसायत और इस्लाम मे उत्तर अफ्रीका से लेकर इराक तक के भाग को इश्वर का बाग़ यानी ईडन गार्डन कहा गया है जहा आदम रहा था ,और पश्चिमी इतिहासकार या तो इसाई है या मुस्लमान इसीलिए उन्होंने अफ्रीका को मानव के जन्म का स्थान बताया है ।

पश्चिमी इतिहासकार और भाषावैज्ञानिको को संस्कृत का बहोत कम ज्ञान है और कई लोगो ने तो संस्कृत में पीएचडी तक की है ,पर फिर भी संस्कृत के मामले में वे लोग पिछड़े हुए है ।
अब मैं आपको बताऊंगा की अपने संस्कृत के कम ज्ञान के सहारे भाषावैज्ञानिको ने जिस प्रोटो इंडो यूरोपियन भाषा का निर्माण किया है वह कई खामियों से भरी पड़ी है ।
भाषावैज्ञानिको ने ऋग्वेद के द्यौस ,यूनानी ज़ीउस और रोम के जुपिटर में समानता देखि और इस निर्णय पर आये की ये तीनो एक ही शब्द से उत्पन्न हुए है ,जो की प्रोटो इंडो यूरोपियन शब्द द्येउस (Dyeus) से है और संस्कृत का द्यौस उसका सबसे करीबी है ।

प्रोटो इंडो यूरोपियन भाषा सुनने के लिए यहाँ क्लिक करे : प्रोटो इंडो यूरोपियन 

भाषावैज्ञानिको ने यह पाया की ज़ीउस ,जुपिटर और द्यौस तीनो ही देवताओ के राजा है (ग्रिफ्फित के अनुवाद अनुसार ), पर ऋग्वैदिक मंत्रो में द्यौस पिता को कही भी देवताओ का राजा नहीं कहा गया ,यह केवल भाषावैज्ञानिको का अनुमान था | यदि आप ग्रिफ्फित का ऋग्वेद का अनुवाद पड़े तो ऋग्वेद का मंडल 4 सूक्त 17 का मंत्र 4 के अनुसार द्यौस पिता इंद्र के पिता है और यदि हम आर्य समाज जामनगर  का अनुवाद पड़े इसी मंत्र का तो उसके अनुसार द्यौस का अर्थ शूरवीर है | जबकि हम दुबारा ग्रिफ्फित का अनुवाद देखे और उसमे पुरुष सूक्त देखे तो उसके अनुसार इंद्र पुरुष के नेत्र से उत्पन्न हुए है तो द्यौस पुरुष के माथे से , अर्थात इंद्र द्यौस के पुत्र नहीं ,और यदि आर्य समाज जामनगर  अनुवाद ले तो यहाँ द्यौस का अर्थ आकाश लोक है |
आर्य समाज जामनगर ,ऋग्वेद मंडल 10 सूक्त ९० मंत्र 14 

जब आर्य अभारत से बहार गए तो धीरे धीरे उन्होंने अपना नया धर्म बनाया ,प्राचीन ,फिर प्राचीन इराक यानि सुमेरिया में पुत्र अपने पिता की हत्या कर सिंहासन पर बैठने लगे, राजा द्वारा किये गए इस पाप को छुपाने के लिए कवियों ने एक कहानी गड़ी की जब देवता पापी हो जाते तो उनके पुत्र उनकी हत्या कर गद्दी पर बैठते और न्याय को सदा कायम रखते |
अब यही कहानी कई देशो में गई ,ज़ीउस ने भी अपने पिता क्रोनुस की और जुपिटर ने अपने पिता सैटर्न की हत्या की थी | पश्चिमी भाषावैज्ञानिको ने यही सोचा की द्यौस इंद्र का पिता है और इंद्र भी अपने पिता की हत्या कर देवताओ का राजा बना |
असल में यह बृहस्पति है जो यूनान में ज़ीउस बना और रोम में जुपिटर ,बृहस्पति और जुपिटर दोनों ही बृहस्पति ग्रह से जुड़े हुए है और ज़ीउस ,जुपिटर और बृहस्पति यह तीनो शब्द एक दुसरे से मिलते जुलते है ।

तो भाषावैज्ञानिको ने जिस द्यौस के आधार  पर प्रोटो इंडो यूरोपियन शब्द द्येउस (Dyeus) वह गलत है | इससे हम यह अनुमान लगा सकते है इनकी बनाई 70% भाषा गलत है |

जय माँ भारती

Thursday, April 18, 2013

पश्चिमी मानव विकास की कहानी पर सवाल

यदि आप 19  वि सदी में यूरोप में किसी आदमी से मानव विकास के बारे में पूछते तो वो यही जवाब देता की हम आदम और हव्वा की संताने है ,यही कहानी मुस्लमान भी आपको बताते और यहूदी भी।
आज जब Evolution का सिधांत सामने आया है फिर भी कई लोग आदम और हव्वा की कहानी पर विश्वास रखते है जो की केवल एक मनघडंत कहानी है।
विग्यानुसार मनुष्य केवल एक स्त्री पुरुष से नहीं आ सकता कम से कम आदिमानवो 10 हज़ार की संताने है आज के मनुष्य।
यदि हम आदम और हव्वा की संतान होते तो अपने भाई बहन से शादी कर हम अपना DNA नस्त कर कबके विलुप्त हो गए होते।
चलिए जरा आदम और हव्वा की कहानी पर गौर फरमाते है साथ ही इसके साथ उठते सवालो के जवाब भी देंगे।
आदम और हव्वा की कहानी शुरू होती है  इसराइल के देवता Yehweh की दुनिया की रचना के बाद ।इश्वर पृथ्वी पर 'Eden Garden ' नाम का बाग़ बनाते  है जिसे चार नदिया बाटती  वे नदिया है टिगरिस ,यूफ्रातेस,पिशों और गिहों।
आज टिगरिस और यूफ्रातेस का अस्तित्व है। ये दोनों नदिया आज के इराक में बहती है बाकि दोनों नदिया आजतक नहीं मिली।
यही वजह है की विदेशी जो इसाई, म्मुसलमन और यहूदी है वे इराक को ही सबसे पुराणी सभ्यता बनते है इस सच्चाई को नकार की भारतीय सभ्यता सबसे पुराणी है।
यहाँ इश्वर आदम को बनाते है फिर उसकी फस्लियो से हव्वा को। इश्वर इस दुनिया के हर प्राणी को आदम के पास लाता है  और उनका नामकरण करने कहता है।
कम्करण केबाद इश्वर आदम को कहता है की अब से ये बाग़ तुम्हारा तुम कौनसा भी फल खा सकते हो और किसी भी जानवर का मास खा सकते हो पर याद रखना की ज्ञान के फल  वाले पेड़ का फल न खाना वरना तुम अमृतवा खो दोंगे साथ ही अच्व्हे बुरे की समाज पा लोंगे जिस कारन तुम इस बाग़ में नहीं रह पोंगे।
बाइबिल,कुरान और तोर्रें में साफ़ लिखा है की इश्वर दर गया की फल खाने के बाद वह सब जान जायेंगा और इश्वर की जगह ले लेंगा इसीलिए इश्वर आदम को फल खाने से रोकता है।
ऐसे ही कई दिन बिट गए ।एक साप जो की सैतान था वो हव्वा को अपनी बातो में फसा लेता की फल खालो ।
यहाँ भी लिखा है की केवल औरत जात ही है जो दुसरो की बातो में फसती है।पुरुष कभी नहीं फास्ता।
सैतान की बात मान हव्वा फल खा लेती है और उसकी देख हव्वा भी ।
हव्वा को इस बात के लिए खूब कोस जाता है और इस दुनिया में बुरे लाने वाली खा जाता है।
यह बात जान की आदम ने फल खा लिया इश्वर उन दोनों को बाग़ से निकल देता है।
अब आदम और हव्वा अमृतवा खोने के करे इश्वर से गुहार लगते है।
तरस खाकर इश्वर कहता है की मेरा बेटा मानव बन जन्म लेगा जो तुम्हारे कास्ट दूर करेगा ।
इसाई उस बेटे को ईसा कहते है ,मुस्लमान उसे मुहम्मद और यहूदी उसे मूसा कहते है।
अब इससे कई प्रस्न आते है ।

प्र 1 यदि Yehweh जानता था की आदम फल खायेंग तो अनर्थ हो जायेंगा तो ऐसा पेड बनाया ही क्यों और बनाया तो उसे उस बाग़ में क्यों लगाया ?
उ . क्युकी नहीं Yehweh था या कोई और ये केवल एक मंघदत कहानी है।

प्र 2 यदि फल खाने के बाद ही मानव में समझ आती तो मानव कैसे जीवित था।
उ . ये केवल बकवास है।

प्र 3 यदि हव्वा या औरत दुसरो की बातो में जल्दी फस जाती है और आदम या मर्द नहीं तो हव्वा के पीछे आदम ने भी फल क्यों खाया।
उ. ये झूठ है की केवल औरत ही दुसरो की बातो में जल्दी फसती है ताकि औरतो को दबाकर रखा जाये आपने हाथो के निचे।

प्र 4 यदि वो इश्वर का बेटा ईसा, मुहम्मद या मूसा है तो अबतक लोग अमर क्यों नहीं हुए और उनके कस्त क्यों दूर नहीं हुए।
उ. क्युकी ये सब झूठ है।

प्र5 यदि हव्वा ने फल खा कर मानव को ज्ञान और समझ दी तो उसे पहला पैगम्बर कहना चाहिए न ही आदम को ?
उ. ये धर्म केवल पुरुष प्रधान है इसीलिए ये उमीद छोड़ दो।
ये थी मानव विकास की झूठी कहानी  जो की केवल अन्धविश्वास है ताकि लोगो को मस्सिहा का झासा दे उनसे मन चाह काम कराया जाये।

जय माँ भारती

Sunday, April 14, 2013

अमेज़न महिला हत्यारानो का राज्य

By Dev (Blog Writer)

इतिहास उठाकर देखले आज तक जितने राज्य साम्राज्य हुए उनमे अधिकतर पुरुष प्रधान राज्य थे पर कुछ ही थे जिन्हें महिलाये चलती थी।
इन्ही में से एक ऐसा राज्य था जो आज के तुर्क से लेकर साका (Synthia) तक था।
इनकी रानी महिला तो थी ही पर पूरी फ़ौज ही हसींन महिला हत्यारानिनो की थी जिनकी तलवारे पुरुषो के रक्त के लिए प्यासी थी।
ये थी अमेज़न राज्य की महिला योध्याये जिनका जीकर अक्सर यूनानी मिथकों और कहानियो में मिलता है।
यूनानी में अमेज़न का अर्थ है योधा ।
इन लड़ाकू महिलाओ के बारे में यूनानी लिखते है की ये अप्सराओ सी सुन्दर पर पुरुषो सी तलवार चलाती थी इसीलिए यूनानी उन्हें Androktones कहते यानि पुरुषो को मरने वाली।
इनका जीकर यूनानी महागाथा Iliad में भी है साथ ही जब सको का आक्रमण हुआ था भारत पर तो साका योद्धओ के साथ महिला योद्धाओ का भी उल्लेख है।
अमेज़न यु तो स्वतंत्र तरीके से युद्ध लड़ता या किसी के सहायक राज्य के तौर पर भी।
इनके समाज में केवल औरते ही होती ,पुरुष केवल नौकर होते उनका कोई औदा नहीं था उनके समाज में।
महिलाये खेती,शिकार आदि जैसे अनेक कामे करती।
अपना वंश बनाये रखने हेतु  वर्ष में केवल एक बार ये पास के कबीलों में जाकर पुरुषो  से सम्भोग करती और यदि लड़का होता तो उसे मार दिया जाता या अपने पिता के पास भेज देते या फिर उन्हें कुछ वर्ष पलकर जंगले में छोड़ देती।
लडकियों को वे अपने पास रखती और हर काम सिखाती।
युद्ध के दौरान जिन पुरुषो को बंधी बनाया जाता उन्हें ये अपने नौकर के तौर पर रख लेती। ये उनका काम करते या फिर मनोरजन करते। कियो को सम्भोग हेतु भी रखा जाता।
कई सालो तक इनके अस्तित्व पर शक किया जाता पर हाल ही में तुर्क और यूक्रेन में कुछ कब्र मिले है महिला योधो के जो इनके सच्चाई पर मोहर लगाती है।
उस वक़्त पुरुषो के लिए तो अमेज़न नर्क के बराबर ही होगा।
आज की महिलाओ को इन औरतो से बहादुरी की सिख लेनी चाहिए की कैसे अपनी रक्षा की जाये और समाज में महिलाओ को आगे लाया जाये।
जय माँ भारती
Note(अश्लील सब्दो का प्रयोग करने के लिए कृपया शमा करे)

Saturday, April 13, 2013

काब्बा के काले पत्थर का राज़ और आल्हा की सचाई।

By Aman and Dev ( Blog Writers)

यु तो मेने कई बार मुसलमानों को यह कहते सुना है की पत्थर की पूजा हराम है। पर जब में इनसे पूछता हु की काब्बा में जो काला पत्थर है उसकी पूजा क्यों करते हो तुम ?
कई जवाब नहीं दे पाते और कुछ बोलते है ये पत्थर पैग़म्बर आदम के ज़माने का है ,वे पहले आदमी थे और पैगम्बर इसीलिए हम उनकी याद में इसकी पूजा करते है।
कई तो पूजा करने की बात नहीं करते पर बोलते है की ये अल्लहा की दें है इसीलिए हम चक्कर कटते है इसकी,इससे हमें उर्जा मिलती है पर हम इसकी पूजा नहीं करते।
मुझे और मेरे साथी देव को ये बात पति नहीं इसीलिए हमने छानबीन की और एक राज़ सामने आया जिसे आजतक छुपाये रखा गया।
ये छानबीन दो भाग की है एक मेरा और मेटे मित्र देव की है।

काल पत्थर अल्लह की दें नहीं ( Aman)

मेने काले पत्थर पर कई तर्क सुन रखे थे जैसे ये शिव लिंग है या शनि देव की मूर्ति पर मुझे ये पसंद नहीं आया और यदि वो लिंग है तो उसके साथ योनि होनी चाहिए जो की है नहीं साथ ही शनि देव की मूर्ति तो कतए नहीं क्युकी ये कुछ गोल सी है और शनि देव की मूर्ति तो विशाल चौकोणं होती है ।
तो ये है क्या ?
ये असल में एक उल्का है जो मुहम्मद के जन्म के कई सौ साल पहले अरब में गिरा  था।
600 ई. से पहले यानि इस्लाम से पहले अरब के लोग कुदरत की पूजा करते थे।
ये लोग बंजारे हुआ करते थे और इनके हर काबिले का एक कुल देव होता था।
मक्का और  मदीना उस वक़्त भी अरब के मुख्या शहर थे।
अरबियो के भी कई देवता थे जिसमे मुख्या था चन्द्र देवता इलाह जिसके बारे में आपको देव बतायेंगा।
कुरान में इस  धर्म का जीकर है की इस धर्म के लोग अंध श्रद्धालु थे ,वे पेड़ो को पूजते थे और आमिर सौदागरों को भी ,कुरान अनुसार  आमिर सौदागर अपनी मूर्तिय बनवाते और खुदको भगवन कहते ।
पर अब तक इस बात के सबूत नहीं मिले।
हां वे पैडो की पूजा करते पर मानव की तो बिलकुल नहीं।
पुरातत्व वैज्ञानिको को केवल अभी तक प्राचीन अरब धर्म के देवताओ की मूर्ति मिली है ।अब तक ऐसी नहीं मिली जो सौदागर की है।
पर देखे तो मुहम्मद भी आमिर सौदागर था क्या पता उसने कुरान में उल्लेख कार्य किया हो ?और खुद के बजाये अल्लह नाम का इश्वर बनाया हो।
खैर अब असली बात पर आते है।
जब वह उल्का मेक्का शहर में गिरा  तो सब ने उसे चन्द्र देव इलाह की देन समझी ।
ये लोग इस उल्का की पूजा करने लगे ताकि उन्हें बरकत मिले पर मुहम्मद ने प्राचीन अरब धर्म के सारे के सारे मंदिर तुडवा दिए और बंद करवा दिए तो केवल इसे ही क्यों बक्शा ?
ये आपको देव बतायेंग।

मुहम्मद का पाखंड और पत्थर की सचाई (Dev)

जैसा आपको अमन ने बताया की प्राचीन अरबी उस उल्का को चन्द्र देव की देन समझ पूजा जाता तो इस्लाम में इसे इतना महत्व क्यों है ।
इसका उत्तर है की मुहम्मद एक क्रूर और अत्याचारी आमिर सौदागर था।
वह भी प्राचीन अरबी धर्म को मानता था।
उसके अनेक रिश्तेदार अनेक धर्म का पालन करते।कोई इसाई ,कोई यहूदी यहातक की एक रिश्तेदार को हिन्दू तक कहा गया है।
जिन सौदागरों का उल्लेख कुरान में है वो असल में है ही नहीं बल्कि वह सौदागर खुद मुहम्मद था।
मुहम्मद की क्रूरता को छुपाये रखने हेतु इन सौदागरों की कहानी रची गयी।
मुहम्मद प्राचीन अरबी धर्म के इलाह देवता का भक्त था ।वह मानता की केवल इलाह ही इश्वर है और कोई नहीं और यही इलाह  बाद में जाकर अल्लह बना।
क्युकी वह पत्थर इलाह यानि अल्लह की दें थी करके इस्लाम में उसे पूजने की इज़ाज़त है। रही बात इलाह के मंदिर की तो वो भी उसने नस्त कर दिए क्युकी  वह इलाह का वजूद मिटाकर केवल अल्लह का वजूद चाहता था।
मुहम्मद ने अपनी अमीरी के दम पर मेक्का कब्जाया फिर तो आप जानते ही है।
इलाह की मूर्ति की तस्वीर निचे दी गयी है

जय माँ भारती

Thursday, April 4, 2013

कहानी गिलगमेश और उसके अमृतवा की खोज की (एक प्राचीन इराकी महागाथा)

गिलगमेश या बिलगमेश की वीरगाथा एक मेसोपोटामिया या प्राचीन इराक की वीरगाथा है ।
इस महागाथा को पत्थर की ईट पर लिखा गया था और वे 12 थी पर 12वि सही हालत में न होने के कारन कहानी का अंत कोई नहीं जानता।पर हाल ही में 12वि ईट मिली है और आज में आपको पूरी कहानी बताऊंगा।
ये कहानी है सुमेर शहर के राजा गिलगमेश (3000 ईसापूर्व )की साहसी कारनामो पर है।2500 ईसापूर्व में सर्गोन के पुरे मेसोपोटामिया को जीतने के बाद ये वीरगाथा काफी महसूर हुई ।
सिकंदर के फारस आक्रमण से पहले ये महागाथा वहा बहोत लोकप्रिय थी ।

कहानी

गिलगमेश सुमेर का 5वा एवं शक्तिशाली राजा था,वह आधा मानव और आधा देवता था।वह काफी सुन्दर और हस्त पुस्त था ।कई शहरों को जीतने के बाद उसने उरुक को अपनी राजधानी बनायीं
।अपनी सफलता के कारन और उसके जीतना इस पृथ्वी पर कोई शक्तिशाली न पाकर उसे घमंड हो गया और एक क्रूर राजा बन गया।
वह मजदूरो से अधिक काम कराता और किसी भी सुन्दर कन्या चाहे वो उसके किसी सेनापति की क्यों न हो उसकी इज्ज़त लूट लेता। आखिर लोगो के देवताओ से प्राथना के बाद देवताओ ने उनकी पुकार सुन गिलगमेश का संहार करने एंकि-दू भेज जो की गिलगमेश जितना शक्तिशाली था और एक वन्मनव था। वह जंगले में पशुओ के साथ रहता ।
एक दिन एक शिकारी गिलगमेश के पास गया और उसे बताया की एक वन मानुष है जो उनके फंदों से जानवरों को छुड़ा देता है।
गिलगमेश ने एक सुन्दर देवदासी शमश को एंकि-दू को लुभाकर उरुक लाने भेजा क्युकी उस समय यह मन जाता था की शराब और काम वाष्ण आदमी को सब्याता की और ले जा सकती है।
शमश एंकि-दू के साथ रही और उसे सभ्यता की और ले गयी अब एंकि-दू एक वन मानव नहीं एक सभ्य मानव था ।
उरुक पहोच शमश और एंकि-दू ने शादी कर ली ।
कई दिन उरुक ने रहने के बाद एंकि-दू को गिलगमेश के बारे में पता चला और उसके कुकर्मो के बारे में भी।
एंकि-दू गिलगमेश को चुनौती देने गया।
दोनों के बिच घमासान मल्य युद्ध हुआ आखिर में गिलगमेश को उसकी बुरे का एहसास हुआ और दोनों एक दुसरे की शक्ति से प्रवाहित हो मित्र बनगए।

दोनों मित्रो ने कई शहर जीते आखिर में गिलगमेश को देवताओ के देवदार के बाग़ से देवदार चुराने की शुजी ताकि उसकी लकड़ी से उरुक शहर के दरवाजे बनाये जाये।
एंकि-दू ने पहले तो मन किया पर बाद में मान गया।
दोनों मित्र रस्ते की कई बढाओ को पार कर बाग़ तक पहुचे पर एक मुस्किल थी बाग़ की रक्षा हुबाबा करता था जिसे प्राचीन इराक के वायु देव ने बनाया था।
दोनों हुबाबा से लदे आखिर हुबाबा की मृत्यु हो गयी।
दोनों ने मिल देवदार के वृक्ष कटे और कुछ लकड़ियो की सहयता से एक नाव बनाई ताकि वृष उसमे लाद ले जा सके ।
शहर पहोच गिलगमेश ने उसके दरवाजे बनाये इस बिच हुबाबा की मृयु की खबर देवताओ तक पहोची जिसे सुन इश्तार यानि प्यार की देवी गिलगमेश पर मोहित हो गयी और गिलगमेश के पास अपने प्यार का इज़हार करने गयी।
गिलगमेश ने उसे साफ माना कर दिया।
गिलगमेश ने कहा :- हे प्रेम की देवी इश्तार में तुम्हारे पिछले प्रमो के बारे में जानता हु साथ ही ये भी की जैसे ही तुम्हारा उनसे मन उबा वैसे ही उन सब को मृत्यु देखनी पड़ी।
यह सुन इश्तार अपने पिता अनु के पास गयी और उन्हें स्वर्ग का सांड उरुक पर भेजने के लिए कहा ।
अपने पिता के मन करने के बाद इश्तार ने अनु को धमकी दी की यदि उसके कहा अनुसार नहीं हुआ तो वह नर्क का दरवाजा खोल देगी जिससे हजारो जीन्द मृत(Zombies) बहार आयेंगे और तबाही मचा देंगे ।
विवस हो अनु ने उरुक पर सांड भेज दिया। सांड अपने साथ 7 वर्ष का सुखा लाया ।गिलगमेश और एंकि-दू उस सांड से लड़ने गए ,कई दिन लड़ने के बाद आखिर एंकि-दू ने उस सांड के सिंग पकड़ लिए (निचे दी हुई तस्वीर देखे)और गिलगमेश ने उसे मार डाला ।
पर एंकिदू बहोत घायल हो गया बिलकुल अर्ध्मारा सा इसीलिए वह अब शैया पर ही पड़ा रहता।
एक दिन उसे सपना आया की देवताओ ने सभा बुलाई है और वे कह रहे है की हुबाबा और स्वर्ग के सांड को मरने की वजह से गिलगमेश और एंकि दू ने अपरद किया है इसीलिए इन्हें सजा मिलनी चाहिए मृत्युदंड की पर गिलगमेश सुधर गया है उसे मरना सही नहीं रहेगा पर एंकिदू को तो गिलगमेश का संहार करने के लिए भेज था और अब जोकि गिलगमेश सुधर गया तो एंकिदू का कुछ काम नहीं ,उसका जीवन का लक्ष्य समाप्त हो गया है इसीलिए उसे मृत्युदंड दी जाए।
एंकिदू सपना देख खुदको कोसने लगा ।
वह कहता :- "क्यों में इस निर्दयी मानव दुनिया में आया मैं जंगले में उन पशुओ के साथ ज्यादा सुखी था ।
ह वह नारी शमश क्यों में उसके जाल में फसा नहीं उसके जसल में मैं फास्ता और नाही में उरुक आता।
पर वाही थी जिसने मुझे रोटी दी खाने के लिए और दूध दिया उसने मेरा कितना क्या रखा ,भगवन उसे सदा सुखी रखे।
और गिलगमेश मेरा मित्र मेरा भाई ओह उसने क्या क्या नहीं किया मेरे लिए। मेरे मरन उपरांत वह मेरे लिए सबसे सुन्दर शैया लायेगा। स्वर्ग में मेरा कयल रखने के लिए कई दसिय और रखेल भेजेगा (उस वक़्त किसी आमिर या राजा के साथ जिन्दा रखैले और दास दासिया दफनाई जाती क्युकी यह मन जस्ता था मरने के बाद स्वर्ग में उनकी आवश्कता पड़ेगी )भगवन उसे सदैव जीत दिलाये ।"
यह बात एंकिदू ने गिलगमेश को बताई ,गिलगमेश दुखी हो गया पर वह एंकिदू को दिलासा देता रहा की वह जीवित रहेंगा ।
एंकिदू बहोत बीमार पद गया और आखिर मर गया ।गिलगमेश उसके पास ही था ,उसके मरने के बाद वह उसे जगाने की कोशिस करता पर एंकिदू कुछ नहीं कहता,गिलगमेश ने एंकिदू की दिल की धड़कन देखि वह रुक चुकी थी।
कई दिन तक गिलगमेश उसकी लाश के बाजू में रहा आखिर जब एंकिदू की लाश सड़ने लगी और कीड़े उसे खाने लगे तब गिलगमेश ने उसे सम्मान सहित दफना दिया।
गिलगमेश को दक्खा लगे अपने मित्र की मौत पर वह सोचने लगा जिस कदर उसका प्यारा मित्र मरा क्या उसी कदर वह मरेगा ,गिलगमेश जीना चाहता था वह अमर होना चाहता था तब उसे अपने बड़े बुडो की कहानी याद आई जिउसुद्दु की जो की मनु का इराकी स्वरुप था।उसे याद आया स्वयं देवताओ ने उसे अमरता का राज बताया था ,गिलगमेश उसी का वंशज था जिउसुद्दु उसकी सहयता जरुर करेगा।
गिलगमेश दुनिया के आखिरी छोर की खोज में निकला जहा जिउसुद्दु रहता था।
कई महीनो तक चलने के बाद उसकी हालत भी एंकिदू सी हो गयी,वह स्वयं एंकिदू नजात आता। उसके सारे वस्त्र निकल गए थे और सरीर पर बड़े बड़े बाल आ गए थे।
गिलगमेश दो पहाड़ी के यहाँ पहोचा। उन पहाडियों के बीचो बिच एक गुफा थी जो जिउसिद्दु के घर की ओर जाता पर दो विशाल बिछुओ ने उसका रास्ता रोक लिया ।दोनों से युद्ध कर उन दोनों को गिलगमेश ने मर डाला और गुफा में चला गया।
गुफा में काफी अँधेरा था,बहोत दूर चलने के बाद एक छोर उसे रोशनी नजर आई। उसरी तरफ पहोच उसे एक सुन्दर बाग़ नजर आया ,बाग़ के पास एक सागर था जिसका नाम मृत्यु सागर था और उसके बिच में एक द्वीप पर था जिउसुद्दु का घर।
वह सागर के किनारे पहोच तो एक जल देवी  आई और उसे रोकते हुए बोली की चले जाओ वापस। गिलगमेश ने उसे वह आने का कारन बताया जिसे सुन उस देवी ने उसे समझाया पर वह नहीं माना और आगे चल दिया।
उसे सागर के किनारे एक नाव मिली इसमें जिउसुद्दु माझी था,उस माझी ने भी गिलगमेश को लाख समझाया पर वो मन नहीं आखिर माझी उसे जिउसिद्दु के पास ले गया।
जिउसुद्दु ने गिलगमेश को देखा तो कुश हुआ पर उसकी इच्छा सुन चिंतित हो गया।
गिलगमेश की जिद के बाद जिउसुद्दु मान गया पर एक शर्त राखी ,गिलगमेश को पूरा एक सप्ता बिना सोये बिताना था पर आखिर कुछ दिन न सोने की की कोशिश करने के बाद वह सो गया।
दुखी हो गिलगमेश जाने लगा पर जिउसुद्दु की बीवी ने जिउसिद्दु को गिलगमेश की थोड़ी मदत करने के लिए कहा ।
जिउसुद्दु ने गिलगमेश को रोका और उसे पास ही के अमृत सागर में जसने को कहा जिसकी ताल हटी में एक औषदी थी जो उसको दुबारा जवान बना देगी (बबुली और दुसरे इराकी की शहरों की कहानी अनुसार यह औषदी अमृत्व प्रदान करती है .यह पूरी तरह से सुमेरी कहानी है जो सबसे पहली और असली है )
गिलगमेश अमृत सागर गया और औषद प्राप्त कर उरुक की और गया।
उरुक जाते समय एक तलब आया रस्ते पर तो गिलगमेश उसमे नहाने के लिए गया।
पास ही एक सर्प था जो औषदी की गंद से मोहित हो गया और उसे खा गया। अब सर्प जवान और पहले से अधिक शक्तिशाली बन गया ।उसकी पुराणी केचुली उतर गयी और एक हस्त पुस्त सर्प निकला जो चला गया।
नहाके आने के बाद गिलगमेश ने पाया की औषदी वहा नहीं है साथ ही वहा सर्प की केचुली थी ।वह समझ गया क्या हुआ ।
उसे बहोत दुःख हुआ की उसकी मेहनत एक रेंगने वाले जीव ने नस्त कर दी ।
गिलगमेश उरुक पंहुचा उदास मन से और वह शाशन करने लगा,उसे एहसास हुआ की जग जितना आसन है पर दिल जीतना कठिन इसीलिए अब वह लोगो की भलाई का काम करता ।
कई साल बिड गए और गिलगमेश वृद्ध हो गया उसे अब यह चिंता सताने लगी की उसकी मृत्यु के बाद उसके शारीर और आत्मा का क्या होगा ।
गिलगमेश ने देवता नर्गल को याद किया। नर्गल ने उसे सरीर सहित नर्क में पंहुचा दिया। वहा वह भाधाए पर कर और नर्क के रक्षक को हराकर आगे बड़ा और उसे आखिर एंकिदू की आत्मा मिली।
नर्गल ने भूमि में दरार करदी जिस कारन दोनों मित्र नर्क से बहार आ गए।
गिलगमेश ने एंकिदू से अपना सवाल किया ,जवाब में एंकिदू ने कहा की गिलगमेश इसे सुन नहीं पायेंग पर गिलगमेश की जिद के कारन उसने बताया की इस सरीर को कीड़े खा जाते है और आत्मा पृथ्वी पर भटक मल और सदा हुआ पानी पीती है यदि उसकी कब्र पर रोज आहार न रखा जाये।
कुछ साल पहले तक यही कहानी का अंत मन जाता था की गिलगमेश को मरने के बाद होने वाले कास्ट का पता चलता है पर अभी अभी एक और ईट मिली है जिसके अनुशार गिलगमेश की भी मौत होती है और उसकी आत्मा नर्क में जाती है पर अछे कर्मो के कारन उसे नर्क का न्यायधीश(जज) बना दिया जाता है ।
जय माँ भारती

Wednesday, April 3, 2013

सिकंदर क्या सच में महान था ?

सिकंदर या अलेक्षेन्द्र एक क्रूर और अत्याचारी मकदूनिया का राजा था। उसे केवल साम्राज्य की भूक थी जिसके लिए उसने लाखो के प्राण लिए।
सिकंदर का जन्म मकदून में 356 ईसापूर्व में हुआ था।
बचपन से ही उसे विश्व विजय की चाह थी। उसे अचिल्लेस जो की इलियद नाम की ग्रीक महागाथा का नायक था उसकी तरह बनना था।
सिकंदर बिलकुल अचिल्लेस की तरह युद्ध में अपनी सेना के आगे रहता ।
सिकंदर का पिता फिलिप द्वितीय एक शक्तिशाली राजा था,उसने ग्रीक के कई राज्यों को हराकर एक संघ का निर्माण किया था ।सिकंदर जब 13 वर्ष का था तब उसने अपने पिता की सहयता की थी संघ के कुछ राज्य के बगावत के दौरान।सिकंदर ने भागवत आसानी से दबा दी और वो एक प्रान्त का राज्यपाल बना।
फिलिप ने दूसरी शादी करली जिस कारण सिकंदर और उसकी माँ नाराज हो गयी जिस कारण वे यूनान से मकदून चले गए। इस बिच सिकंदर के कई सौतेले भाई हुए जो यूनान की गद्दी के वारिस होते।
दुबारा संघ के कुछ राज्यों ने बगावत छेद दी और फिलिप की हत्या करा दी।
सिकंदर फ़ौरन यूनान पंहुचा और बगावत फिरसे दबा दी ।
इसके बाद उसने आपने सारे सौतेले भाई बहनों की हत्या करदी साथ ही अपने चचेरे भाइयो को भी नहीं बक्शा ।
बाकि बचे यूनानी राज्यों को संघ में जोड़ सिकंदर ने संघ के सामने विश्वविजय की मुहीम रखी ।
संघ मान गयी और सिकंदर के नेतृत्व में सिकंदर फारस की सेना को हराने चल दिया।
उसके सामने एशिया के कुछ छोटे राज्य थे जिन्हें क्रूरता पूर्व रोंदते हुए वो आगे बड़ा।
फारस की सेना 2.5 लाख की थी और सिकंदर की 40 सहस्त्र(हज़ार) की थी पर उसने फारस को लगातार तिन युधो हराया ।इसका कारन ये नहीं सिकंदर महान था पर फारस का राजा दरस एक कमजोर राजा था ,उसके खुदके साम्राज्य में बड़े हिस्से में उसकी नहीं चलती थी।
फारस जीतने के बाद कई औरतो की अबरू  लूटी गयी ,कई नगर जलाये गए क्यों ?क्युकी इससे पहले फारस यूनान पर दो बार नाकाम हमले कर चूका था सिर्फ इसी का बदला लेने के लिए। कई फारस के मंदिर तोड़े गए वो भी इसीलिए क्युकी सिकंदर उन्हें दूबारा अपने तरीके से बनाना चाहता था ।
326 ईसापूर्व में  सिकंदर भारत की सीमा पर पहोच गया था।
बड़ा अजीब दृश्य था। हजारो 6फुट के  फारसी सेनिक और उनके बीचो बिच 5.6 का सिकंदर जिसके बदन पर मेडुसा के चित्र का कवच था ।
गंधार और अम्बिसर सिकंदर के साथ मिल गए जबकि पुरु ने उससे लड़ने की ठानी ।
युद्ध हुआ और पुरु ने सिकंदर से अपना लोहा मनवाया ।सिकंदर और पुरु के हजारो सेनिक मारे गए। सिकंदर सोच में पड़ गया अगर युद्ध जारी रहा तो उसका बहोत नुकशान होगा इसीलिए सिकंदर ने संधि करली ।
भारतीयों द्वारा इतना कड़े मुकाबले के बाद यूनानी सेनिको ने नन्द से लड़ने से मना कर दिया ।नन्द भले ही बुरा हो पर काफी शक्तिशाली था और पुरु की 15 सहस्त्र के सेना ने ये हाल किया था तो नन्द की 2.5 लाख की सेना तो मिटा ही डालती उन्हें ।
अपनी सेना के विरोध के बाद उसने भारत से जाने की सोची साथ ही उसे अरब पर भी आक्रमण करना था ।
भारत से जाते वक़्त उसने कई नगर उजाड़े।
बेबीलोन अनपी राजधानी पहोचने के बाद उसने नन्द से लड़ने की तयारी शुरू करदी पर संघ और सेना को ये पसंद नहीं आया ।वे भारत जैसे भीम काई शत्रु पर आक्रमण कर सबकुछ गवाना नहीं चाहते थे।
यदि युद्ध होता तो जो धन सिकंदर फारस से जीता था वो यूनान भेजने के बजाये युद्ध में लगादेता और ये नहीं संघ को मंजूर था नहीं सेनिको को , इसीलिए 323 ईसापूर्व में सिकंदर की हत्या करदी गयी और वही दूसरी तरफ उसके एक लौटे बेटे की भी।
उसका साम्राज्य तिन राज्यों में बट गया ।
जो राजा साम्राज्य के पीछे हो वो महान कैसा और इतनो की जान लेने वाला महान योधा नहीं होता।
महान वो है जो सबके दिलो को जीते अगर मारनेवाला महान है तब तो हिटलर को भी महान कहना चाहिए ।

जय माँ भारती