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Thursday, January 21, 2016

पाणिनि का समयकाल

इंटरनेट पर कई लोग मिल जाएँगे जो कई तरह की उल जलूल बातें करते है। मैं भी एक सज्जन से मिला जिनके अनुसार संस्कृत यूनानी भाषा का Lingua Franca है और पाणिनि जी ने यूनानी भाषा के प्रभाव में आकर सस्कृत व्याकरण लिखा। वे सज्जन एक स्वघोषित इतिहासकार है और उनका कहना है की वे श्वेत यूरोपीय इतिहासकारो के झूठे इतिहास की पोल खोलते है और अश्वेत लोगो का सच्चा इतिहास बताते है, क्योंकि वे सज्जन एक अफ़्रीकी अमेरिकन है इसलिए वे अश्वेत लोगो के इतिहास का गौरवपूर्ण सच बताने की कोशिश  करते है।

उनका कहना था की हिन्द-यूरोपीय भाषा परिवार का कोई अस्तित्व ही नहीं और यह केवल यूरोपीय इतिहासकारो का झूठ है ताकि वे श्वेत आर्य नस्ल की महानता बता सके। उनके अनुसार संस्कृत और यूनानी भाषा और अन्य दूसरी यूरोपिय भाषाओ में इतनी समानताए इसलिए है क्योंकि पाणिनि ने यूनानी भाषा का अध्यन कर संस्कृत में कई परिवर्तन किये और बाद में संस्कृत पुरे भारत में फैली। उनके अनुसार तो संस्कृत का 500 ईसापूर्व से पहले अस्तित्व ही नहीं था और वेद भी इस काल से पहले लिखे नहीं गए थे। उन सज्जन का यह सिद्धान्त केवल एक ही बात पर टिका हुआ था, वह था की पाणिनिजी ने अष्टाध्यायी में "यवनानि" शब्द मिला है जिसका अर्थ ज्यादातर विद्धवान बताते है "यवनो की लिपि" या "यवनी स्त्री"। महर्षि पतंजलि ने यवनानि शब्द का अर्थ "यवनो की लिपि" बताया है, तो मैं भी इसी बात के साथ चलता हु।
चुकी पाणिनिजी तक्षिला में ज्ञानप्राप्ति के लिए गए थे और तक्षिला में विश्वभर से लोग आते थे तो शायद पाणिनिजी को किसी यवनी से ही उनकी लिपि के बारे में पता चला होगा।

चुकी मैं भी पश्चिमी इतिहासकारो के इतिहास पर विश्वास नहीं रखता तो मैंने सोचा की इन साहब की बातें सुन कर देख लेते है।
उन सज्जन ने एक वीडियो बनाया था जिसके अनुसार गांधार में यवनो का शासन था, तब पाणिनि जी ने उनसे उनका व्याकरण सीखा और उसका उपयोग अष्टाध्यायी की रचना के लिए किया।

वीडियो शुरू हुए 1 मिनट भी नहीं हुआ था की मैंने वीडियो रोका और उन साहब से पूछा: " पाणिनि जी के काल में यवनी भारत में थे ही नहीं, वे तो बाद में आये थे सिकंदर के आने के बाद।"
मैंने वीडियो देखना शुरू किया तो उसमे आया की पाणिनि जी ने अष्टाध्यायी में यवनानि शब्द का उपयोग किया है, साथ ही पाणिनि से पहले सस्कृत का कुछ अता पता ही था, वह तो Lingua Franca था। Lingua Franca उस भाषा को कहते है जो दो व्यक्तियो के लिए वार्तालाप के उपयोग में आता है जब वे दोनों एक दूसरे की भाषा समझ नहीं सकते, उधारण: अंग्रेजी ।

अगले दिन उन साहब का रिप्लाय आया, उन्होंने कहा: "यवनी पाणिनि से पहले से गांधार में रह रहे थे। फारसियों ने गांधार विजय के बाद वहा यवनियो को बसाया था।"

तो मैंने रिप्लाय किया: " यवनी तो फारसियों के दुश्मन थे तो वे अपने ही दुश्मन को अपने ही राज्य में क्यों बसाएंगे?

तो वे महाशय बोले: "तुम्हे किसी चीज़ का ज्ञान नहीं है वगेरा वगेरा।"

तो मैंने उन्हें लिखा: "आपको ही किसी चीज़ का ज्ञान नहीं है, आप केवल नस्लवाद फैला रहे है और अश्वेतों का झूठा इतिहास फैला रहे है। किसी भी फ़ारसी लेख में इस बात का ज़िक्र नहीं है की उन्होंने यूनानियो को गांधार में बसाया था। पाणिनि ने यह बात कही नहीं कही है की उन्होंने यवनो से ज्ञान प्राप्त किया है और तब संस्कृत का निर्माण किया। पाणिनि महाजनपदों का उल्लेख किया है पर किसी यवन देश का नहीं, उन्होंने सिंधु घंटी में लगभग 500 गाँवो का उल्लेख किया है पर किसी भी यवनी बस्ती का नहीं। सिकंदर के इतिहासकारो ने भारत में किसी यवन बस्ती का उल्लेख नहीं किया।( प्लुटार्च ने लिखा था की भारत में यवनो की कुछ बस्तिया थी जब सिकंदर वहा आया था, पर प्लुटार्च सिकंदर के मारने के लगभग 300 वर्ष बाद पैदा हुआ था तो उसकी बातों को सही नहीं मान सकते।)"

तब उनका रिप्लाय आया: "मैंने कब कहा की पाणिनि ने सस्कृत का निर्माण किया है, मैंने कहा की पाणिनि ने यूनानी भाषा से ससंस्कृत व्याकरण का निर्माण किया।"

मैंने जवाब दिया: "पाणिनि ने संस्कृत व्याकरण का निर्माण नहीं किया अपितु उसमे कई सुधार किये। पाणिनि से पहले कई वैयाकरण हुए जैसे की यास्क आदि, तो यह कहना की पाणिनि ने संस्कृत के व्याकरण का निर्माण किया यह गलत है।" (यह महाशय अपने वीडियो में कह चुके है की पाणिनि ने संस्कृत का निर्माण किया पर बाद में पलट गए।)

उनका जवाब: "मैंने यह नहीं कहा की संस्कृत व्याकरण का निर्माण पाणिनि ने किया( यह व्यक्ति दुबारा से पलट गया), मैंने कहा उन्होंने यवनी व्याकरण का उपयोग संस्कृत में किया। और संस्कृत का 500 ईसापूर्व से पहले कोई अस्तित्व ही नहीं था और नाही इसका कोई साबुत है।"

मैंने जवाब दिया: "भाई यहाँ बात यवनी भाषा की हो रही है और आप संस्कृत पर आ टपके, पर आपकी कही बात गलत है। मित्तानि साम्राज्य और हित्तिते साम्राज्य के बिच में हुए संधि पत्र में इंद्र,वरुण,अग्नि आदि देवो का उल्लेख है जो सिद्ध करता है की संस्कृत 1500 उसपूर्व से भी पुरानी है।"

मैं एक के बाद एक जवाब दिए जा रहा था और उसके नसलवादि सिद्धान्तों की धज्जिया उड़ा रहा था।वह इतना तिलमिलिया की उसके अगले जवाब में उसका गुस्सा नज़र आ रहा था।

उसने भेजा: "आर्य नस्ल के लोग 1000 ईसापूर्व पहले भारत आये थे और उन्होंने द्रविड़ों के नगरो को ध्वस्त कर दिया था। भारतीय पुरातत्वशास्त्री बी.बी.लाल ने भी कहा है की आर्य भूरे मृद्भांड संस्कृति( Painted Grey Ware Culture) से तालुक रखते थे। साबित करो संस्कृत 4000 ईसापूर्व पुरानी है।"

मैं समझ गया की यह बंदा बात पलटने की कोशिश कर रहा है, मैंने उसे लिख भेजा: " भाई मैंने कब दावा किया की संस्कृत 4000 ईसापूर्व पुरानी है जो में साबित करू। मैं तुम्हे कई सबूत दे चूका हु की तुम्हारी बातें गलत है और वे केवल नस्लवादी है। तुम मुझे सबूत अपने सिद्धान्त को सिद्ध करने के लिए।"

उनका जवाब: "पाणिनि ने अष्टाध्यायी में यवनानि शब्द का उपयोग किया है।"

यह पड़कर मुझे काफी गुस्सा आया। मैं पहले ही साबित कर चूका था की यवनी पाणिनि के काल में थे ही नहीं फिर भी यह मुर्ख उसी बात पर टिक हुआ है। मैंने फैसला किया की मैं अब इसे उत्तर नहीं दूंगा क्योंकि मैं इसके सवालो के जवाब दे चूका हु और दुबारा देकर क्या फायदा जब इस व्यक्ति के मस्तिक्ष में कुछ जाये ही नहीं। यह व्यक्ति अपने काल्पनिक दुनिया में रहता है और मेरे समझाने का इसपर कोई असर नहीं होगा।

जय माँ भारती।

Saturday, June 21, 2014

प्रोटो इंडो यूरोपियन भाषा का मिथक (Myth of the Proto Indo European Language)

पश्चिमी भाषावैज्ञानिक और इतिहासकारों ने यह पाया की यूनानी ,लैटिन और संस्कृत में कई समानता है और इन तीनो भाषाओ की एक ही जननी है जिसे इन्होने प्रोटो इंडो यूरोपियन यानि हिंदी में आदिम या प्राचीन हिंद यूरोपीय भाषा कहते है ।
पश्चिमी इतिहासकारों का मानना है की पश्चिम यूरोप और मध्य एशिया की सीमा के आसपास रहने वाले लोग प्रोटो इंडो यूरोपियन बोलते थे ,फिर वे लोग अलग अलग बट गए और कई अन्य भाषाओ में बदल गए और प्रोटो इंडो यूरोपियन विलुप्त हो गई । अब कई वर्ष तक संस्कृत पर काम करने के बाद भाषावैज्ञानिको ने प्रोटो इंडो यूरोपियन को दुबारा बना लिया है ,क्युकी संस्कृत अन्य आर्य भाषाओ में प्रोटो इंडो के सबसे करीबी है इसीलिए उसे चुना गया ।
पर इस सिधांत में कई खामिया है । मैं कोई भाषा वैज्ञानिक नहीं हु और इस बारे में ज्यादा नहीं जनता ,पर जितना जनता हु उसी से इन पश्चिमी इतिहासकारों की पोल खोलूँगा ।
सच यह है की संस्कृत ही सभी भाषाओ की जननी है और हिमालय आर्यों की जन्मभूमि ।प्रोटो इंडो यूरोपियन जैसी कोई भाषा ही नहीं है, अब जब प्रोटो इंडो यूरोपीय भाषा लुप्त हो चुकी है तो आपको कैसे पता की संस्कृत उसके सबसे करीबी है ?? और यदि प्रोटो इंडो यूरोपीय भाषा थी और संस्कृत उसके करीबी है तो प्रोटो इंडो यूरोपियन भाषा का गढ़ भारत होना चाहिए ,क्युकी पश्चिम यूरोप और मध्य एशिया की भाषाए प्रोटो इंडो से दूर है तो साफ़ है की आर्य भारत से निकले और कास्पियन सागर जो मध्य एशिया और पश्चिमी यूरोप के पास है वहा बसे ,अब उन्हें वहा पहोचने के लिए कई वर्ष लगे इसीलिए उनकी भाषाओ में कई विकृतिया आई गई और वह प्रोटो इंडो यूर्प्पियन भाषा से अलग हो गई ।

पश्चिमी इतिहासकारों को यह बिलकुल पसंद नहीं की उनके पूर्वज भारत के हो । ईसायत और इस्लाम मे उत्तर अफ्रीका से लेकर इराक तक के भाग को इश्वर का बाग़ यानी ईडन गार्डन कहा गया है जहा आदम रहा था ,और पश्चिमी इतिहासकार या तो इसाई है या मुस्लमान इसीलिए उन्होंने अफ्रीका को मानव के जन्म का स्थान बताया है ।

पश्चिमी इतिहासकार और भाषावैज्ञानिको को संस्कृत का बहोत कम ज्ञान है और कई लोगो ने तो संस्कृत में पीएचडी तक की है ,पर फिर भी संस्कृत के मामले में वे लोग पिछड़े हुए है ।
अब मैं आपको बताऊंगा की अपने संस्कृत के कम ज्ञान के सहारे भाषावैज्ञानिको ने जिस प्रोटो इंडो यूरोपियन भाषा का निर्माण किया है वह कई खामियों से भरी पड़ी है ।
भाषावैज्ञानिको ने ऋग्वेद के द्यौस ,यूनानी ज़ीउस और रोम के जुपिटर में समानता देखि और इस निर्णय पर आये की ये तीनो एक ही शब्द से उत्पन्न हुए है ,जो की प्रोटो इंडो यूरोपियन शब्द द्येउस (Dyeus) से है और संस्कृत का द्यौस उसका सबसे करीबी है ।

प्रोटो इंडो यूरोपियन भाषा सुनने के लिए यहाँ क्लिक करे : प्रोटो इंडो यूरोपियन 

भाषावैज्ञानिको ने यह पाया की ज़ीउस ,जुपिटर और द्यौस तीनो ही देवताओ के राजा है (ग्रिफ्फित के अनुवाद अनुसार ), पर ऋग्वैदिक मंत्रो में द्यौस पिता को कही भी देवताओ का राजा नहीं कहा गया ,यह केवल भाषावैज्ञानिको का अनुमान था | यदि आप ग्रिफ्फित का ऋग्वेद का अनुवाद पड़े तो ऋग्वेद का मंडल 4 सूक्त 17 का मंत्र 4 के अनुसार द्यौस पिता इंद्र के पिता है और यदि हम आर्य समाज जामनगर  का अनुवाद पड़े इसी मंत्र का तो उसके अनुसार द्यौस का अर्थ शूरवीर है | जबकि हम दुबारा ग्रिफ्फित का अनुवाद देखे और उसमे पुरुष सूक्त देखे तो उसके अनुसार इंद्र पुरुष के नेत्र से उत्पन्न हुए है तो द्यौस पुरुष के माथे से , अर्थात इंद्र द्यौस के पुत्र नहीं ,और यदि आर्य समाज जामनगर  अनुवाद ले तो यहाँ द्यौस का अर्थ आकाश लोक है |
आर्य समाज जामनगर ,ऋग्वेद मंडल 10 सूक्त ९० मंत्र 14 

जब आर्य अभारत से बहार गए तो धीरे धीरे उन्होंने अपना नया धर्म बनाया ,प्राचीन ,फिर प्राचीन इराक यानि सुमेरिया में पुत्र अपने पिता की हत्या कर सिंहासन पर बैठने लगे, राजा द्वारा किये गए इस पाप को छुपाने के लिए कवियों ने एक कहानी गड़ी की जब देवता पापी हो जाते तो उनके पुत्र उनकी हत्या कर गद्दी पर बैठते और न्याय को सदा कायम रखते |
अब यही कहानी कई देशो में गई ,ज़ीउस ने भी अपने पिता क्रोनुस की और जुपिटर ने अपने पिता सैटर्न की हत्या की थी | पश्चिमी भाषावैज्ञानिको ने यही सोचा की द्यौस इंद्र का पिता है और इंद्र भी अपने पिता की हत्या कर देवताओ का राजा बना |
असल में यह बृहस्पति है जो यूनान में ज़ीउस बना और रोम में जुपिटर ,बृहस्पति और जुपिटर दोनों ही बृहस्पति ग्रह से जुड़े हुए है और ज़ीउस ,जुपिटर और बृहस्पति यह तीनो शब्द एक दुसरे से मिलते जुलते है ।

तो भाषावैज्ञानिको ने जिस द्यौस के आधार  पर प्रोटो इंडो यूरोपियन शब्द द्येउस (Dyeus) वह गलत है | इससे हम यह अनुमान लगा सकते है इनकी बनाई 70% भाषा गलत है |

जय माँ भारती

Friday, April 4, 2014

महरौली के लोह स्तंभ में वर्णित राजा चंद्र की पहचान (Identity of King Chandra of Iron Pillor of Mehrauli )

इतिहासकारों ने महरौली के लोह स्तंभ को सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय के काल में रखा है और लोह स्तंभ में वर्णित राजा चंद्र को चंद्रगुप्त द्वितीय से जोड़ दिया है ।
कुछ इतिहासकार मानते है की उस लोह स्तंभ में जो लेख है वो गुप्त लेखो की शैली का है और कुछ कहते है की चंद्रगुप्त द्वितीय के धनुर्धारी सिक्को में एक स्तंभ नज़र आता है जिसपर गरुड़ है ,पर वह स्तंभ कम और राजदंड अधिक नज़र आता है ।
लोह स्तंभ के अनुसार राजा चंद्र ने वंग देश को हराया था और सप्त सिंधु नदियों के मुहाने पर वह्लिको को हराया था ।
जेम्स फेर्गुससनजैसे पश्चिमी इतिहासकार मानते है की यह लोह स्तंभ गुप्त वंश के चंद्रगुप्त द्वितीय का है ।
कुछ इतिहासकारों के अनुसार यह स्तंभ सम्राट अशोक का है जो उन्होंने अपने दादा चंद्रगुप्त मौर्य की याद में बनवाया था ।

जे.ऍफ़.फ्लीट के अनुसार वह गुप्त वंश का चंद्रगुप्त प्रथम है ,पर फ्लीट मानते है की यह लेख समुद्रगुप्त के अलाहबाद स्तंभ और कुमारगुप्त प्रथम के बिल्साद लेख से मिलता जुलता है ।
फ्लीट यह भी कहते है की शायद यह स्तंभ हुन नरेश मिहिरकुल के छोटे भाई चंद्र का होगा और इस बात का उल्लेख युआन च्वांग करते हुए कहते है की यह स्तंभ मिहिरपुर में है ।
समुद्रगुप्त के आर्यवर्त विजय से यह साफ़ होता है की उत्तर बंगाल या वंग पहले से ही समुद्रगुप्त के साम्राज्य में था जो उसे उसके पिता चंद्रगुप्त प्रथम से मिला ,इसीलिए वंग देश को हराने की बात चंद्रगुप्त प्रथम पर सही बैठती है ।पर सप्त सिंधु पर समुद्रगुप्त ने विजय पाई थी और वह भी कुषाणों से जिसका वर्णन उसके अलाहबाद स्तंभ पर है साथ ही सप्त सिंधु चंद्रगुप्त प्रथम के साम्राज्य में नहीं था ।
हरप्रसाद शास्त्री अनुसार राजा चंद्र असल में वर्मन वंश के राजा चंद्रवर्मन है ,सिंहवर्मन का पुत्र जो पुष्करण पर राज करता था सुसनिया लेख अनुसार ।
पर सुसनिया लेख चंद्रवर्मन को कोई सम्राट या विजेता के रूप में नहीं दर्शाता ।
ऐसे में लोह स्तंभ के राजा चंद्र की पहचान करना कठिन है ।
ए.वी. वेंकटराम एयर और हेमचंद्र राय चौधरी अनुसार राजा चंद्र और कोई नहीं बल्कि पुराणों का सदचंद्र है जो भारशिव वंश का था और विदिशा का राजा था ,पर सदचंद्र के राज में भारशिव वंश विदिशा तक ही सिमट गया था और ना ही किसी अन्य ग्रंथ में सदचंद्र के विजयो के साबुत है ।
अधिकतर इतिहासकार वी.ए स्मिथ से सहमत है की राजा चंद्र असल में चंद्रगुप्त द्वितीय है पर एलन मानते है की स्मिथ का यह तर्क केवल लेखो के अधार पर है ।
लोह स्तंभ लेख अनुसार राजा चंद्र का साम्राज्य दक्षिण सागर तक है और यह बात समुद्रगुप्त पर सही बैठती है क्युकी उसने दक्षिण भारत में भी युद्ध किये थे जो चंद्रगुप्त प्रथम और चंद्रगुप्त द्वितीय ने नहीं किया ।
लेख में वंग देशो को या उनके संघ को हराने की बात कही है ,अलाहबाद स्तंभ लेख में वंग देशो का उल्लेख नहीं है यानी की वंग पहले से ही समुद्रगुप्त के साम्राज्य का भाग होगा ।
लेख में सप्त सिंधु के मुहाने पर वह्लिको को हराने का जीकर है ।रामायण में इस बात का उल्लेख है की ऋषि वशिष्ठ ने अपना संदेश राजा भरत को पहोचने के लिए एक व्यक्ति को भेजा था ।
वह संदेशवाहक वह्लिक देश से होते हुए सुदामन पर्वत जाता है और विष्णुपद (लोह स्तंभ में इसी जगह स्तंभ गाड़ने का वर्णन है ) देखता है और दो नदिया विपासा और सल्माली नदी देखता है ।
लेख में आगे लिखा है की राजा चंद्र धरती के साथ साथ स्वर्ग को भी जीत लिया ।
दी.आर.भंडारकर के अनुसार किसी भी मनुष्य के लिए स्वर्ग जितना नामुमकिन काम है ,इसीलिए यहाँ आकाश या किसी उचे पर्वत की बात की गई है जहा राजा चंद्र ने अपने अंतिम दिन गुजारे।
जे.सी घोष अनुसार यह विष्णुपद वही पर्वत है जिसका जीकर रामायण में है ।
इसके अलावा कुछ इतिहासकार मानते है की हुन राजा मिहिरकुल का राज उत्तर भारत में था और विष्णुपद भी ,वही से मिहिरकुल इस लोह स्तंभ को महरौली ले आया ।

यह थी इतिहासकारों की राय जो इसी पर है की चंद्रगुप्त द्वितीय ही राजा चंद्र है पर एक भी ठोस साबुत नहीं दे पाए ।
अब मैं अपनी राय आगे रख रहा हु ।मेरे पास कुछ साबुत है जो इस ओर इशारा करते है की इस लोह स्तंभ का चंद्रगुप्त द्वितीय या गुप्त वंश से कोई रिश्ता नहीं है ।
1. गुप्त राजाओ ने महाराजाधिराज की उपाधि धारण की थी और गुप्त लेखो में गुप्त राजाओ के नाम के साथ महाराजाधिराज मिलेगा ही मिलेगा ,लेकिन इस स्तंभ में राजा चंद्र के नाम के साथ महाराजाधिराज है ही नहीं ।

2. अधिकतर गुप्त लेखो में हमें गुप्त वंशावली मिलेगी पर इस लोह स्तंभ पर गुप्त वंशावली है ही नहीं ,हा कुछ गुप्त लेखो में हमें गुप्त वंशावली नहीं मिलती पर उनमे उन लेखो को खुदवाने वाले राजा का पूरा नाम और महाराजाधिराज उपाधि जरुर मिलती है ।

3. लोह स्तंभ के अनुसार राजा चंद्र ने सप्त सिन्धु नदियों के मुहाने पर वह्लिको को हराया था पर कालिदास जो चंद्रगुप्त द्वितीय की सभा में थे वे यह लिखते है की चंद्रगुप्त द्वितीय ने हूणों को हराया था सिंधु घाटी में ,साथ ही कालिदास कही भी वह्लिको से युद्ध का जीकर नहीं करते ।

यह तो सिद्ध हो गया की यह लोह स्तंभ गुप्तो का नहीं है तो सवाल उठता है की यह स्तंभ आखिर है किसका ??

इसके दो उत्तर हो सकते है :-
पहला यह की यह किसी स्थानीय राजा ने खुदके या खुदके पूर्वज की बड़ाई करने हेतु बनवाया था ,पर बड़ाई या तारीफ करने के लिए कोई लोह के बजाये पत्थर को चुनेगा ,अर्थात यह सच में किसी प्रतापी राजा ने बनवाया होगा ।
तो दूसरा उत्तर होगा की यह स्तंभ चंद्रगुप्त मौर्य का है ,इसके पीछे सिधांत यह है :-
1. वह्लिक ईरानी लोग थे जो अफगान में रहने लगे और उनका इतिहास 2000 ईसापूर्व पुराना है ।भारतीय कालगणना अनुसार चंद्रगुप्त मौर्य 1400 ईसापूर्व या 1000 ईसापूर्व में जन्मा था और उस समय तक वह्लिको का फैलाव सिंधु घाटी तक था ,चंद्रगुप्त मौर्य का युद्ध वह्लिको से जरुर हुआ होगा ।

2. लोह स्थंभ अनुसार वंग देशो के संघ के साथ राजा चंद्र का युद्ध हुआ था और संघ या गण संघ महाजनपद काल के थे जो चंद्रगुप्त मौर्य का ही काल था ।

3. लोह स्तंभ अनुसार राजा चंद्र ने दक्षिण समुद्र तक के राज्य जीते थे और चंद्रगुप्त मौर्य भी ।

4. लोह स्तंभ विष्णु को समर्पित है और चाणक्य के अर्थशास्त्र में विष्णु की पूजा का उल्लेख है अर्थात यह उसी काल का है ।

जैसा मैंने अपने पिछले लेख "हिंदू सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य " में बताया की चंद्रगुप्त मौर्य जैन नहीं बल्कि हिंदू थे और वे अपने अंतिम समय में विष्णुपद पर जाकर बस गए ।

जय माँ भारती

Saturday, February 8, 2014

वैशाली का युद्ध ( Battle of Vaishali )

{{ज्ञानसन्दूक युद्ध
काल = 490 ईसापूर्व।
स्थल = गंगा घाटी और वैशाली।
सेना = दोनों सेना के पास लगभग समान संख्या है सेना की ।शायद बड़ा चड़ाकर पेश किया है ,दोनों सेना के पास 1 लाख के करीब सेना होगी पर फिर भी जैन ग्रंथ में दिए अकड़े देखते है ।
57000 हाथी दोनों सेना के पास
57000 घोड़े दोनों ही सेना के पास
57000 रथ दोनों ही सेना के पास
और 5 लाख 70 हज़ार सेनिक दोनों ही सेना के पास ।

सेना का नेतृत्व :-
मगध राज्य
अजातशत्रु
10 कलाकुमार
वस्सकर

णसंघ
चेतक
विरुधक
मनुदेव

युद्ध का परिणाम :-
अजातशत्रु की वैशाली,मल्ल ,काशी,कोसल आदि राज्यों पर जीत ।

वैशाली का युद्ध या जैन ग्रंथो में इसे महासिलाकंताका कहा गया है । भारत के इतिहास में यह युद्ध काफी महत्त्व रखता है क्युकी इस युद्ध में अजातशत्रु ने तलवार वाले रथ ,गुलेल और झूलने वाली गदा का उपयोग पहली बार किया था ।इस युद्ध ने मगध की सीमाए दूर दूर तक फैलाई ।
जैन ग्रंथो में इस युद्ध की वजह हल्ला और विहल्ला कुमार को बिम्बिसार के दिए तोफे कहे गए है जो की एक हीरे का हार था और सेचानक नाम का हाथी था ,अजातशत्रु सम्राट बन गया और तब अजातशत्रु ने हल्ला और विहल्ला को वे तोफे उसे देने को कहा पर दोनों राजकुमारों ने मना कर दिया और अपने नाना चेतक के पास गए जो वैशाली के राजा थे ,अजातशत्रु ने राजा चेतक को उन दोनों कुमारो को उसे सोपने को कहा पर चेतक ने मना कर दिया ,इसीलिए यह युद्ध हुआ ।
बोध ग्रंथ अनुसार इस युद्ध का कारन हीरो की खदान पर अधिकार को लेकर था ।
यदि इन दोनों बातो को को सही माने और इन्हें जोड़े तो यह बात सामने आती है की हीरो की खदान अजातशत्रु को चाहिए थी पर क्युकी मगध और वैशाली के पारिवारिक संबंध थे इसीलिए अजातशत्रु कुछ नहीं कर पाया पर जब हल्ला और विहल्ला ने वैशाली में शरण ली तब उसे एक अच्छा मौका मिल गया और फिर युद्ध शुरू हुआ ।

युद्ध :-
अजातशत्रु ने अपने प्रधान मंत्री वस्सकर और अपने सोतेले भाइ कालकुमारो के साथ युद्ध की रणनीति बनाना शुरू की  । अजातशत्रु जानता था की वैशाली पर पहले भी हमले हुए है और वैशाली अबतक नहीं हारा इसीलिए उसने काफी बड़ी सेना जमा की ।
मगध इरादा था गंगा घाटी के मैदानों का लाभ उठाना और इसके लिए इस युद्ध में अजातशत्रु ने हाथी,रथ और घोड़े उतारे।
यही निति वैशाली की भी थी ,वैशाली मगध के मुकाबले छोटा था इसीलिए उसने 9 लिच्चावी राजा जिसमे मनुदेव भी थे उन्हें अपने साथ ले लिया,9 मल्ल राजाओ को और काशी -कोशल के नरेश विरुधक को अपने साथ ले लिया,चुकी विरुधक और अजातशत्रु में काशी को लेकर विवाद था इसीलिए विरुधक ने राजा चेतक का साथ दिया ।
सेना का ढाचा आम था ,आगे पैदल सेना ,पीछे घुड़सवार ,उनके पीछे रथ और सबसे पीछे हाथी ।
राजा चेतक धनुर विद्या में उस्ताद था ,उसके बाणों से बचना नामुमकिन था और इसी कारण राजा चेतक को को अजय कहा जाता था पर राजा चेतक जैन बन गए थे और उन्होंने वर्धमान महावीर को वचन दिया था की वे एक दिन में एक ही बाण चलाएंगे ।
युद्ध शुरू हुआ और अजातशत्रु के गुलेल(Catapult) ने आतंक मचा दिया वैशाली संघ के सेनिको में ,पर राजा चेतक ने 10 कालकुमारो में से एक को अपने बाण से मार डाला ।
इसिकादर अगले 9 दिन में एक एक कर कालकुमार मरते गए और मगध कमजोर पड़ गया ।
3 दिन अजातशत्रु ने इंद्र की आराधना की और फिर रथ मुसल नाम का रथ युद्धभूमि पर उतरा ।
उसके पहियों पर तलवार लगी थी और लटकने वाली गदा जो एक बार में कई सेनिको को मार डालती ।
अब बाज़ी अजातशत्रु के हाथ में आ गई थी और राजा चेतक बुरी तरह हार गए।
राजा चेतक अपने बचे सेनिको के साथ वैशाली नगर पहोचे और उसके द्वार बंद कर दिए ,अजातशत्रु ने वैशाली पर आक्रमण किया पर उसकी मजबूत दिवार अभेद्य थी इसीलिए वह पीछे हट गया ।
वस्सकर को एक युक्ति सूजी और उसने कुलावक नाम के जैन भिक्षु के पास एक स्त्री भेजी जिसका नाम मगधिका था ।
कुलावक मगधिका के प्रेम में पड गया और मगधिका ने कुलावक को अजातशत्रु के लिए काम करने के लिए राजी किया ।
वस्सकर ने कुलावक को वैशाली में जाने को कहा और यह अफवाह फ़ैलाने को कहा की वैशाली के लोग जिस चैत्य को पूज्य मानते है वही वैशाली के दुर्गति का कारण है।
कुलावक अपने काम में सफल हुआ और इसीलिए कुछ लोगो ने उस चैत्य को उखाड़ फेका ,पर कई इस बात के विरोध में थे इसी कारण वैशाली के लोगो में आपस में ही झगडा हो गया ।
इस अवसर का लाभ उठा अजातशत्रु ने वैशाली पर हमला किया और विजय प्राप्त की ।

जय माँ भारती